भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 187

अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८१ युक्तम् । सर्वं च जगद्भयवद् | होनेवाला भय सम्भव नहीं था । | किन्तु सारा ही संसार भययुक्त दृश्यते । तस्माज्जगतो भयदर्श- | देखा जाता है । अतः जगत्को | भय होता देखनेसे जाना जाता है नाद्गम्यते नूनं तदस्ति भयकारण- | कि उसके भयका कारण उच्छेदका मुच्छेदहेतुरनुच्छेद्यात्मकं यतो | हेतुभूत किन्तु स्वयं अनुच्छेद्यरूप | ब्रह्म है, जिससे कि जगत् भय जगद्विभेतीति । तदेतस्मिन्नप्यर्थ | मानता है । इसी अर्थमें यह श्लोक एष श्लोको भवति ॥ १ ॥ | भी है ॥ १ ॥ इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां सप्तमोऽनुवाकः ॥ ७ ॥