भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 181

अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७५ यस्माद्वा स्वयमकरोत्सर्वं अथवा, क्योंकि सर्वरूप होने- से ब्रह्मने स्वयं ही इस सम्पूर्ण सर्वात्मना तस्मात्पुण्यरूपेणापि जगत्की रचना की है, इसलिये पुण्यरूपसे भी उसका कारणरूप तदेव ब्रह्म कारणं सुकृतमुच्यते । वह ब्रह्म 'सुकृत' कहा जाता है। लोकमें जो कार्य [ पुण्य अथवा सर्वथापि तु फलसंबन्धादि- पाप ] किसी भी प्रकारसे फलके कारणं सुकृतशब्दवाच्यं प्रसिद्धं सम्बन्ध आदिका कारण होता है वही 'सुकृत' शब्दके वाच्यरूपसे प्रसिद्ध लोके । यदि पुण्यं यदि वान्यत्तसा होता है। वह प्रसिद्धि चाहे पुण्य- रूपा हो और चाहे पापरूपा किसी प्रसिद्धिर्नित्ये चेतनवत्कारणे नित्य और सचेतन कारणके होनेपर ही हो सकती है । अतः उस सत्युपपद्यते । तस्मादस्ति तद्ब्रह्म सुकृतरूप प्रसिद्धिकी सत्ता होनेसे यह सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म है। सुकृतप्रसिद्धेः । इतश्चास्ति । ब्रह्म इसलिये भी है; किस लिये ? रस- स्वरूप होनेके कारण । ब्रह्मकी कुतः ? रसत्वात् । कुतो रसत्व- रसरूपताकी प्रसिद्धि किस कारण- से है-इसपर श्रुति कहती है— सिद्धिर्ब्रह्मण इत्यत आह— यद्वै तत्सुकृतम् । रसो वै जो भी वह प्रसिद्ध सुकृत है वह ब्रह्मगो सः । रसो नाम निश्चय रस ही है । खट्टा-मीठा रसरूपत्वम् तृप्तिहेतुरानन्दकरो आदि तृप्तिदायक और आनन्दप्रद पदार्थ लोकमें 'रस' नामसे प्रसिद्ध मधुराम्लादिः प्रसिद्धो लोके है ही । इस रसको ही पाकर पुरुष रसमेवायं लब्ध्वा प्राप्यानन्दी आनन्दी अर्थात् सुखी हो जाता है। लोकमें किसी असत् पदार्थकी सुखी भवति । नासत आनन्द- आनन्दहेतुता कभी नहीं देखी गयी । हेतुत्वं दृष्टं लोके । बाह्यानन्द- ब्रह्मनिष्ठ निरीह और निरपेक्ष विद्वान् साधनरहिता अप्यनीहा निरषणा बाह्यसुखके साधनसे रहित होनेपर