भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 261 में से

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पृष्ठ 180

१७४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ समय यह अभयको प्राप्त हो जाता है; और जब यह इसमें थोड़ा-सा भी भेद करता है तो इसे भय प्राप्त होता है। वह ब्रह्म ही भेददर्शी विद्वान्के लिये भयरूप है। इसी अर्थमें यह श्लोक है ॥ १ ॥


[वाम भाग / संस्कृत मूल एवं भाष्य]

असद्वा इदमग्र आसीत् । (टिप्पणी: असच्छब्दवाच्याव्याकृताज्जगदुत्पत्तिः) असदिति व्याकृत- नामरूपविशेषविप- रीतरूपमव्याकृतं ब्रह्मोच्यते । न पुनरत्यन्तमेवा- सत् । न ह्यसतः सज्जन्मास्ति इदमिति नामरूपविशेषवद्व्याकृतं जगदग्रे पूर्वं प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मैवास- च्छब्दवाच्यमासीत् । ततोऽसतो वै सत्प्रविभक्तनामरूपविशेष- मजायतोत्पन्नम् । किं ततः प्रविभक्तं कार्यमिति पितुरिव पुत्रः, नेत्याह । तदस- च्छब्दवाच्यं स्वयमेवात्मानमेवा- कुरुत कृतवत् । यस्मादेवं तस्मा- द्ब्रह्मैव सुकृतं स्वयंकर्तृच्यते । स्वयंकर्तृ ब्रह्मेति प्रसिद्धं लोके सर्वकारणत्वात् ।


[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या]

पहले यह [ जगत् ] असत् ही था। 'असत्' इस शब्दसे, जिनके नाम-रूप व्यक्त हो गये हैं उन विशेष पदार्थोंसे विपरीत स्वभाववाला अव्याकृत ब्रह्म कहा जाता है। इससे [ वन्ध्यापुत्रादि ] अत्यन्त असत् पदार्थ बतलाये जाने अभीष्ट नहीं हैं; क्योंकि असत्से सत्का जन्म नहीं हो सकता । 'इदम्' अर्थात् नाम-रूप विशेषसे युक्त व्याकृत जगत् अग्रे—पहले अर्थात् उत्पत्तिसे पूर्व 'असत्' शब्दवाच्य ब्रह्म ही था । उस असत्से ही सत् यानी जिसके नाम-रूपका विभाग हो गया है उस विशेषकी उत्पत्ति हुई । तो क्या पितासे पुत्रके समान यह कार्यवर्ग उस [ ब्रह्म ] से विभिन्न है ? इसपर श्रुति कहती है—नहीं; उस 'असत्' शब्दवाच्य ब्रह्मने स्वयं अपनेको ही रचा । क्योंकि ऐसी बात है इसलिये वह ब्रह्म ही सुकृत अर्थात् स्वयंकर्ता कहा जाता है; सबका कारण होनेसे ब्रह्म स्वयं कर्ता है—यह बात लोकमें प्रसिद्ध है ।


CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

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