तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 165, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९ कामयितृत्वत्वादस्मदादिवदना- | शङ्का—कामना करनेवाला होनेसे | तो वह हमारी-तुम्हारी तरह अनाप्त- प्तकाममिति चेत् ? | काम (अपूर्ण कामनावाला) सिद्ध होगा। | न, स्वातन्त्र्यात् । यथारन्यान् | समाधान—ऐसी बात नहीं है, | क्योंकि वह स्वतन्त्र है। जिस प्रकार परवशीकृत्य कामादिदोषाः | काम आदि दोष अन्य जीवोंको | विवश करके प्रवृत्त करते हैं प्रवर्तयन्ति न तथा ब्रह्मणः | उस प्रकार वे ब्रह्मके प्रवर्तक नहीं | हैं। तो वे कैसे हैं ? वे सत्य-ज्ञान- प्रवर्तकाः कामाः । कथं तर्हि | स्वरूप एवं स्वात्मभूत होनेके | कारण विशुद्ध हैं। उनके द्वारा सत्यज्ञानलक्षणाः स्वात्मभूतत्वा- | ब्रह्म प्रवृत्त नहीं किया जाता; बल्कि | जीवोंके प्रारब्ध-कर्मोंकी अपेक्षासे द्विशुद्धा न तैर्ब्रह्म प्रवर्त्यते । | वह ब्रह्म ही उनका प्रवर्तक है। | अतः कामनाओंके करनेमें ब्रह्मकी तेषां तु तत्प्रवर्तकं ब्रह्म प्राणि- | स्वतन्त्रता है। इसलिये ब्रह्म अनाप्त- | काम नहीं है। कर्मापेक्षया । तस्मात्स्वातन्त्र्यं | | किन्हीं अन्य साधनोंकी अपेक्षा- कामेषु ब्रह्मणः । अतो नानाप्त- | वाला न होनेसे भी कामनाओंके | विषयमें ब्रह्मकी स्वतन्त्रता है। जिस कामं ब्रह्म । | प्रकार धर्मादि कारणोंकी अपेक्षा | रखनेवाली अन्य जीवोंकी अनात्मभूत साधनान्तरानपेक्षत्वाच्च । किं | कामनाएँ अपने आत्मासे अतिरिक्त | देह और इन्द्रियरूप अन्य साधनों- च यथान्येषामनात्मभूता धर्मा- | की अपेक्षावाली होती हैं उस प्रकार | ब्रह्मको निमित्त आदिकी अपेक्षा दिनिमित्तापेक्षाः कामाः स्वात्म- व्यतिरिक्तकार्यकरणसाधनान्त- रापेक्षाश्च न तथा ब्रह्मणो निमि-