तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 164, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
नोपलभ्येत । उपलभ्यते तु; होनेके कारण ग्रहण ही नहीं किया तस्मादस्ति ब्रह्म । असतश्चेत्कार्यं जा सकता था । किन्तु वह ग्रहण किया ही जाता है; इसलिये ब्रह्म है गृह्यमाणमप्यसदनुन्वितमेव तत् ही । यदि यह कार्यवर्ग असत्से स्यात् । न चैवम्; तस्मादस्ति उत्पन्न हुआ होता तो ग्रहण किये जानेपर भी असदात्मक ही ग्रहण ब्रह्म तत्र । “कथमसतः सज्जायेत” किया जाता । किन्तु ऐसी बात है नहीं । इसलिये ब्रह्म है ही । इसी ( छा० उ० ६ । २ । २ ) इति सम्बन्धमें “असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है” ऐसी एक अन्य श्रुत्यन्तरमसतः सज्जन्मासंभव- श्रुतिने युक्तिपूर्वक असत्से सत्का जन्म होना असम्भव बतलाया है । मन्वाचष्टे न्यायतः । तस्मात्सदेव इसलिये ब्रह्म सत् ही है—यही मत ब्रह्मेति युक्तम् । ठीक है । तद्यदि मृद्बीजादिवत्कारणं शङ्का—यदि ब्रह्म मृत्तिका और बीज आदिके समान [ जगत्का स्यादचेतनं तर्हि ? उपादान ] कारण है तो वह अचेतन होना चाहिये । न, कामयितृत्वात् । न हि समाधान—नहीं, क्योंकि वह कामना करनेवाला है । लोकमें कोई ब्रह्मगणश्चित्स्वरूपत्व- कामयित्रचेतनमस्ति भी कामना करनेवाला अचेतन नहीं विवेचनम् लोके । सर्वज्ञं हि हुआ करता । ब्रह्म सर्वज्ञ है—यह ब्रह्मेत्यवोचाम । अतः कामयि- हम पहले कह चुके हैं । अतः उसका कामना करना भी युक्त तृत्वोपपत्तिः । ही है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri