तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ
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अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७
तत्रासदेव ब्रह्मेत्याशङ्क्यते । | इसमें यह आशंका की जाती है
कस्मात् ? यदस्ति तद्विशेषतो | कि ब्रह्म असत् ही है । ऐसा क्यों
| है ? क्योंकि जो वस्तु होती है वह
गृह्यते यथा घटादि । यन्नास्ति | विशेषरूपसे उपलब्ध हुआ करती
| है; जैसे कि घट आदि । और जो
तन्नोपलभ्यते यथा शशविषाणा- | नहीं होती उसकी उपलब्धि भी नहीं
| होती; जैसे-शशशृंगादि । इसी
दि । तथा नोपलभ्यते ब्रह्म । | प्रकार ब्रह्मकी भी उपलब्धि नहीं
| होती । अतः विशेषरूपसे ग्रहण न
तस्माद्विशेषतोऽग्रहणान्नास्तीति । | किया जानेके कारण वह है ही नहीं ।
तन्न; आकाशादिकारणत्वा- | ऐसी बात नहीं है; क्योंकि ब्रह्म
| आकाशादिका कारण है । ब्रह्म नहीं
द्ब्रह्मणः । न नास्ति ब्रह्म । कस्मा- | है-ऐसी बात नहीं है । क्यों नहीं
दाकाशादि हि सर्वं कार्यं ब्रह्मणो | है ? क्योंकि ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ
| आकाशादि सम्पूर्ण कार्यवर्ग
जातं गृह्यते । यस्माच्च जायते | देखनेमें आता है । जिससे किसी
किंचित्तदस्तीति दृष्टं लोके; यथा | वस्तुका जन्म होता है वह पदार्थ
| होता ही है-ऐसा लोकमें देखा गया
घटाङ्कुरादिकारणं मृद्बीजादि । | है; जैसे कि घट और अङ्कुरादिके
| कारण मृत्तिका एवं बीज आदि ।
तस्मादाकाशादिकारणत्वादस्ति | अतः आकाशादिका कारण होनेसे
ब्रह्म । | ब्रह्म है ही ।
न चासतो जातं किंचिद् | लोकमें असत्से उत्पन्न हुआ
| कोई भी पदार्थ नहीं देखा जाता ।
गृह्यते लोके कार्यम् । असतश्चेन्ना- | यदि नाम-रूपादि कार्यवर्ग असत्से
मरूपादि कार्यं निरात्मकत्वा- | उत्पन्न हुआ होता तो वह निराधार