तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 168, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ सृज्यमानजगद्रचनादिविषयामा- कि आत्माने रचे जानेवाले जगत्की लोचनामकरोदात्मेत्यर्थः । रचना आदिके विषयमें आलोचना की । स एवमालोच्य तपस्तप्त्वा इस प्रकार आलोचना अर्थात् तप प्राणिकर्मादिनिमित्तानुरूपमिदं करके उसने प्राणियोंके कर्मादि निमित्तोंके अनुरूप इस सम्पूर्ण सर्वं जगद्देशतः कालतो नाम्ना जगत्को रचा, जो देश, काल, रूपेण च यथानुभवं सर्वैः नाम और रूपसे यथानुभव सारी प्राणिभिः सर्वावस्थैरनुभूयमानम- अवस्थाओंमें स्थित सभी प्राणियोंद्वारा अनुभव किया जाता है । यह जो सृजत सृष्टवान् । यदिदं किं च कुछ है अर्थात् सामान्यरूपसे यह यत्किं चेदमविशिष्टम् । तदिदं जो कुछ जगत् है इसे रचकर उसने जगत्सृष्ट्वा किमकरोदित्युच्यते- क्या किया, सो बतलाते हैं—वह उस रचे हुए जगत्में ही अनुप्रविष्ट तदेव सृष्टं जगदनुप्राविशदिति । हो गया । तत्रैतच्चिन्त्यं कथमनुप्राविश- अब यहाँ यह विचारना है कि उसने किस प्रकार अनुप्रवेश किया ? तस्य जगदनु- दिति । किं यः जो स्रष्टा था, क्या उसने स्वस्वरूपसे प्रवेशः स्रष्टा स तेनैवात्म- ही अनुप्रवेश किया अथवा किसी और रूपसे ? इनमें कौन-सा पक्ष नानुपाविशदुतान्येनेति, किं ता- समीचीन है ? श्रुतिमें [ 'सृष्ट्वा' इस क्रियामें ] 'क्त्वा' प्रत्यय होनेसे तो वद्युक्तम् ? क्त्वाप्रत्ययश्रवणाद्यः यही ठीक जान पड़ता है कि जो स्रष्टा स्रष्टा स एवानुप्राविशदिति । था उसीने पीछे प्रवेश भी किया । *
- 'क्त्वा' प्रत्यय पूर्वकालिक क्रियामें हुआ करता है । हिन्दीमें इसी अर्थमें 'कर' या 'के' प्रत्यय होता है; जैसे—'रामने श्यामको बुलाकर [ या बुलाके ] धमकाया ।' इसमें यह नियम होता है कि पूर्वकालिक क्रिया और मुख्य क्रियाका कर्ता एक ही होता है; जैसे कि उपर्युक्त वाक्यमें पूर्वकालिक क्रिया 'बुलाकर' तथा मुख्य क्रिया 'धमकाया' इन दोनोंका कर्ता 'राम' ही है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri