तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६१
त्वं वा । यथाकाशस्याल्पत्वं बहु- | कि आकाशका अल्पत्व और बहुत्व | भी अन्य वस्तुके ही अधीन है त्वं च वस्त्वन्तरकृतमेव । अतस्त- | [उसी प्रकार ब्रह्मका भी है] । अतः | उन (नाम-रूपों) के द्वारा ही ब्रह्म द्द्वारेणैवात्मा बहु भवति । | बहुत हो जाता है । न ह्यात्मनोऽन्यदनात्मभूतं | आत्मासे भिन्न अनात्मभूत, तथा | उससे भिन्न देश-कालमें रहनेवाली तत्प्रविभक्तदेशकालं सूक्ष्मं व्यव- | कोई भी सूक्ष्म, व्यवहित (ओटवाली), | दूरस्थ, अथवा भूत, वर्तमान या भविष्यकालीन हितं विप्रकृष्टं भूतं भवद्भविष्यद्वा | वस्तु नहीं है । अतः सम्पूर्ण वस्तु विद्यते । अतो नामरूपे | अवस्थाओंसे सम्बन्धित नाम और सर्वावस्थे ब्रह्मणैवात्मवती, न | रूप ब्रह्मसे ही आत्मवान् हैं, किन्तु ब्रह्म तदात्मकम् । ते तत्प्रत्या- | ब्रह्म तद्रूप नहीं है । ब्रह्मका निषेध ख्याने न स्त एवेति तदात्मके | करनेपर वे रह ही नहीं सकते, | इसीसे वे तद्रूप कहे जाते हैं । उन उच्येते । ताभ्यां चोपाधिभ्यां | उपाधियोंसे ही ब्रह्म ज्ञाता, ज्ञेय और | ज्ञान-इन शब्दोंका तथा इनके अर्थ ज्ञातृज्ञेयज्ञानशब्दार्थादिसर्वसं- | आदि सब प्रकारके व्यवहारका पात्र व्यवहारभाग्ब्रह्म । | बनता है । स आत्मैवंकामः संस्तपो- | उस आत्माने ऐसी कामनावाला ऽतप्यत । तप इति ज्ञानमुच्यते । | होकर तप किया । 'तप' शब्दसे | यहाँ ज्ञान कहा जाता है, जैसा कि “यस्य ज्ञानमयं तपः” ( मु० उ० | “जिसका ज्ञानरूप तप है” इस अन्य १ । १ । ८) इति श्रुत्यन्तरात् । | श्रुतिसे सिद्ध होता है । आप्तकाम | होनेके कारण आत्माके लिये अन्य आप्तकामताच्चेतरस्यासंभव एव | तप तो असम्भव ही हैं । 'उसने तपसः । तत्तपोऽतप्यत तप्तवान् । | तप किया' इसका तात्पर्य यह है तै० उ० २१-२२- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri