तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११ नन्वस्ति भयनिमित्तं साध्व- शङ्का—किन्तु शुभ कर्मका न करणं पापक्रिया च ? करना और पापकर्म करना यह तो भयका कारण है ही ? नैवम्; कथमित्युच्यते—एतं समाधान—ऐसी बात नहीं है । यथोक्तमेवंचिदम्, ह वावेत्यव- किस प्रकार नहीं है सो बतलाया जाता है—इस पूर्वोक्तको अर्थात् इस धारणार्थो, न तपति नोद्वेज- प्रकार जाननेवालेको वह तप्त—उद्विग्न यति न संतापयति । कथं पुनः अर्थात् सन्तप्त नहीं करता । मूलमें 'ह' और 'वाव' ये निश्चयार्थक साध्वकरणं पापक्रिया च न निपात हैं । वह पुण्यका न करना तपतीत्युच्यते । किं कस्मात्साधु और पापक्रिया उसे किस प्रकार शोभनं कर्म नाकरवं न कृतवा- ताप नहीं देते ? इसपर कहते हैं—'मैंने शुभ कर्म क्यों नहीं किया' नस्मीति पश्चात्संतापो भवत्या- ऐसा पश्चात्ताप मरणकाल समीप सन्ने मरणकाले । तथा किं आनेपर हुआ करता है तथा 'मैंने कस्मात्पापं प्रतिषिद्धं कर्माकरवं पाप यानी प्रतिषिद्ध कर्म क्यों किया' ऐसा दुःख नरकपात आदि- कृतवानस्मीति च नरकपतनादि- के भयसे होता है । ये पुण्यका न दुःखभयात्तापो भवति । ते एते करना और पापका करना इस साध्वकरणपापक्रिये एवमेनं न विद्वान्को इस प्रकार सन्तप्त नहीं करते जैसे कि वे अविद्वान्को किया तपतो यथाविद्वांसं तपतः । करते हैं । कस्मात्पुनर्विद्वांसं न तपत वे विद्वान्को क्यों सन्तप्त नहीं इत्युच्यते—स य एवंविद्वानेते करते ? सो बतलाया जाता है—ये साध्वसाधुनी तापहेतू इत्यात्मानं पाप-पुण्य ही तापके हेतु हैं—इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् स्पृणुते प्रीणयति बलयति वा आत्माको प्रसन्न अथवा सबल करता CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri