तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 218, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं यथावत पाठ प्रस्तुत है:
२१२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ परमात्मभावेनोभे पश्यतीत्यर्थः । | है अर्थात् इन दोनोंको परमात्मभाव- | से देखता है [ उसे ये पाप-पुण्य उभे पुण्यपापे हि यस्मादेवमेष | सन्तप्त नहीं करते ] । क्योंकि ये | पाप-पुण्य दोनों ऐसे हैं [ अर्थात् विद्वानेते आत्मानमात्मरूपेणैव | आत्मस्वरूप हैं ] अतः यह विद्वान् | इस पाप-पुण्यरूप आत्माको आत्म- पुण्यपापे स्वेन विशेषरूपेण | भावनासे ही अपने विशेषरूपसे | शून्य कर आत्माको ही तृप्त करता शून्ये कृत्वात्मानं स्पृणुत एव । | है । वह विद्वान् कौन है ? जो इस | प्रकार जानता है अर्थात् पूर्वोक्त को य एवं वेद यथोक्तमद्वैत- | अद्वैत एवं आनन्दस्वरूप ब्रह्मको | जानता है । उसके आत्मभावसे मानन्दं ब्रह्म वेद तस्यात्मभावेन | देखे हुए पुण्य-पाप निर्वीर्य और | ताप पहुँचानेवाले न होनेसे दृष्टे पुण्यपापे निर्वीर्ये अतापके | जन्मान्तरके आरम्भक नहीं होते । जन्मान्तरारम्भके न भवतः । | इतीयमेवं यथोक्तास्यां वल्लयां | इस प्रकार इस वल्लीमें, जैसी कि | ऊपर कही गयी है, यह ब्रह्मविद्या- ब्रह्मविद्योपनिषत्सर्वाभ्यो विद्या- | रूप उपनिषद् है । अर्थात् इसमें | अन्य सब विद्याओंकी अपेक्षा परम भ्यः परमरहस्यं दर्शितमित्यर्थः । | रहस्य प्रदर्शित किया गया है । इस परं श्रेयोऽस्यां निषण्णमिति ॥ १ ॥ | विद्यामें ही परम श्रेय निहित है ॥१॥ इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ तैत्तिरीयोपनिषद्भाष्ये ब्रह्मानन्दवल्ली समाप्ता । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri