तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 219, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंभृगुवल्ली प्रथम अनुवाक भृगुका अपने पिता वरुणके पास जाकर ब्रह्मविद्याविषयक प्रश्न करना तथा वरुणका ब्रह्मोपदेश सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्माकाशा- | क्योंकि सत्य, ज्ञान और अनन्त दिकार्यमन्नमयान्तं | ब्रह्म ही आकाशसे लेकर अन्नमय- उपक्रमः सृष्ट्वा तदेवानुप्रविष्टं | पर्यन्त कार्यवर्गको रचकर उसमें | अनुप्रविष्ट हो सविशेष-सा उपलब्ध विशेषवदिवोपलभ्यमानं यस्मा- | हो रहा है इसलिये वह सम्पूर्ण त्स्मात्सर्वकार्यविलक्षणमदृश्यादि- | कार्यवर्गसे विलक्षण अदृश्यादि धर्म- | वाला आनन्द ही है; और वही मैं धर्मकमेवानन्दं तदेवाहमिति | हूँ—ऐसा जानना चाहिये; क्योंकि विजानीयादनुप्रवेशस्य तदर्थत्वा- | उसके अनुप्रवेशका यही उद्देश्य | है । इस प्रकार जाननेवाले उस त्तस्यैवं विजानतः शुभाशुभे | साधकके शुभाशुभ कर्म जन्मान्तरका कर्मणी जन्मान्तरारम्भके न | आरम्भ करनेवाले नहीं होते । | आनन्दवल्लीमें यही विषय कहना भवत इत्येवमानन्दवल्ल्यां विव- | अभीष्ट था । अब ब्रह्मविद्या तो क्षितोऽर्थः परिसमाप्ता च ब्रह्म- | समाप्त हो चुकी । यहाँसे आगे | ब्रह्मविद्याके साधन तपका निरूपण विद्या । अतः परं ब्रह्मविद्या- | करना है तथा जिनका पहले | निरूपण नहीं किया गया है उन साधनं तपो वक्तव्यमन्नादिविष- | अन्नादिविषयक उपासनाओंका भी याणि चोपासनान्यनुक्तानीत्यत | वर्णन करना है; इसीलिये इस
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