भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

२१४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३ इदमारभ्यते— | प्रकरणका आरम्भ किया जाता है— भृगुर्वै वारुणिः वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तस्मा एतत्प्रोवाच । अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति । तँहोवाच । यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्य- भिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद् ब्रह्मेति । स तपो- ऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥ वरुणका सुप्रसिद्ध पुत्र भृगु अपने पिता वरुणके पास गया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका बोध कराइये ।' उससे वरुणने यह कहा—'अन्न, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन और वाक् [ ये ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं ] ।' फिर उससे कहा—'जिससे निश्चय ही ये सब भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर जिसके आश्रयसे ये जीवित रहते हैं और अन्तमें विनाशोन्मुख होकर जिसमें ये लीन होते हैं उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा कर; वही ब्रह्म है ।' तब उस ( भृगु ) ने तप किया और उसने तप करके—॥ १ ॥ आख्यायिका विद्यास्तुतये, पिताने अपने प्रिय पुत्रको इस प्रियाय पुत्राय पित्रोक्तेति— (विद्या) का उपदेश किया था— इस दृष्टिसे यह आख्यायिका विद्याकी भृगुर्वै वारुणिः । वैशब्दः प्रसि- स्तुतिके लिये है । 'भृगुर्वै वारुणिः' इसमें 'वै' शब्द प्रसिद्धका स्मरण द्वानुस्मारको भृगुरित्येवंनामा करानेवाला है । इससे 'भृगु' इस नामसे प्रसिद्ध ऋषिका अनुस्मरण प्रसिद्धोऽनुस्मार्यते । वारुणिर्वरु- कराया जाता है जो वारुणि अर्थात् णस्यापत्यं वारुणिर्वरुणं पितरं वरुणका पुत्र था । वह ब्रह्मको

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