भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१५

ब्रह्म विजिज्ञासुरुपससारोपगत- | जाननेकी इच्छावाला होकर अपने वान्, अधीहि भगवो ब्रह्मेत्य- | पिता वरुणके पास गया। अर्थात् नेन मन्त्रेण । अधीहि अध्यापय | 'हे भगवन् ! आप मुझे ब्रह्मका कथय । स च पिता विधिवदुप- | उपदेश कीजिये' इस मन्त्रके द्वारा सन्नाय तस्मै पुत्रायैतद्वचनं | [ उसने गुरूपसदन किया ] । प्रोवाच । अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं | 'अधीहि' शब्दका अर्थ अध्यापन मनो वाचमिति । | ( उपदेश ) कीजिये—कहिये ऐसा अन्नं शरीरं तदभ्यन्तरं च | समझना चाहिये । उस पिताने [वरुणोपदिष्ट-ब्रह्मप्राप्तिद्वाराणि] प्राणमत्तारमुपल- | अपने पास विधिपूर्वक आये हुए ब्धिसाधनानि चक्षुः | उस पुत्रसे यह वाक्य कहा—'अन्नं श्रोत्रं मनो वाचमित्येतानि ब्रह्मो- | प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनः वाचम् ।' पलब्धौ द्वाराण्युक्तवान् । उक्त्वा | 'अन्न अर्थात् शरीर उसके भीतर च द्वारभूतान्येतान्यन्नादीनि तं | अन्न भक्षण करनेवाला प्राण, भृगुं होवाच ब्रह्मणो लक्षणम् । | तदनन्तर विषयोंकी उपलब्धिके किं तत् ? | साधनभूत चक्षु, श्रोत्र, मन और यतो यस्माद्वा इमानि ब्रह्मा- | वाक् ये ब्रह्मकी उपलब्धिमें द्वाररूप [ब्रह्मलक्षणम्] दीनि स्तम्बपर्यन्तानि | हैं'—ऐसा उसने कहा । इस भूतानि जायन्ते । | प्रकार इन द्वारभूत अन्नादिको येन जातानि जीवन्ति प्राणा- | बतलाकर उसने उस भृगुको ब्रह्मका न्धारयन्ति वर्धन्ते । विनाशकाले | लक्षण बतलाया। वह क्या है ? | [ सो बतलाते हैं— ] | जिससे ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त | ये सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, | जिसके आश्रयसे ये जन्म लेनेके | अनन्तर जीवित रहते—प्राण धारण | करते अर्थात् वृद्धिको प्राप्त होते हैं | तथा विनाशकाल उपस्थित होनेपर

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