तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 229, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ अनुवाक आनन्द ही ब्रह्म है—ऐसा भृगुका निश्चय करना तथा इस भार्गवी वारुणी विद्याका महत्त्व और फल आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता । स य एवं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति, प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥१॥ आनन्द ब्रह्म है—ऐसा जाना; क्योंकि आनन्दसे ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर आनन्दके द्वारा ही जीवित रहते हैं और प्रयाण करते समय आनन्दमें ही समा जाते हैं। वह यह भृगुकी जानी हुई और वरुणकी उपदेश की हुई विद्या परमाकाशमें स्थित है। जो ऐसा जानता है वह ब्रह्ममें स्थित होता है; वह अन्नवान् और अन्नका भोक्ता होता है; प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥ एवं तपसा विशुद्धात्मा | इस प्रकार तपसे शुद्धचित्त हुए प्राणादिषु साकल्येन ब्रह्मलक्षण- | भृगुने प्राणादिमें पूर्णतया ब्रह्मका मपश्यञ्शनैः शनैरन्तरनुप्रविश्या- | लक्षण न देखकर धीरे-धीरे भीतरकी ओर प्रवेश कर तपरूप साधनके CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri