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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

षष्ठ अनुवाक आनन्द ही ब्रह्म है—ऐसा भृगुका निश्चय करना तथा इस भार्गवी वारुणी विद्याका महत्त्व और फल आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता । स य एवं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति, प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥१॥ आनन्द ब्रह्म है—ऐसा जाना; क्योंकि आनन्दसे ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर आनन्दके द्वारा ही जीवित रहते हैं और प्रयाण करते समय आनन्दमें ही समा जाते हैं। वह यह भृगुकी जानी हुई और वरुणकी उपदेश की हुई विद्या परमाकाशमें स्थित है। जो ऐसा जानता है वह ब्रह्ममें स्थित होता है; वह अन्नवान् और अन्नका भोक्ता होता है; प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥ एवं तपसा विशुद्धात्मा | इस प्रकार तपसे शुद्धचित्त हुए प्राणादिषु साकल्येन ब्रह्मलक्षण- | भृगुने प्राणादिमें पूर्णतया ब्रह्मका मपश्यञ्शनैः शनैरन्तरनुप्रविश्या- | लक्षण न देखकर धीरे-धीरे भीतरकी ओर प्रवेश कर तपरूप साधनके CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

२२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत मूल एवं भाष्य]

न्तरतममानन्दं ब्रह्म विज्ञातवां- स्तपसैव साधनेन भृगुः । तस्माद्ब्र- ह्मविजिज्ञासुना बाह्यान्तःकरण- समाधानलक्षणं परमं तपःसाधन- मनुष्ठेयमिति प्रकरणार्थः ।

अधुनाख्यायिकातोऽपसृत्य श्रुतिः स्वेन वचनेनाख्यायिका- निर्वर्त्यमर्थमाचष्टे—सैषा भार्गवी भृगुणा विदिता वरुणेन प्रोक्ता वारुणी विद्या परमे व्योमन्हृदया- काशगुहायां परम आनन्देऽद्वैते प्रतिष्ठिता परिसमाप्तान्नमयादात्म- नोऽधिप्रवृत्ता । य एवमन्योऽपि तपसैव साधनेनानेनैव क्रमेणा- नुप्रविश्यानन्दं ब्रह्म वेद स एवं विद्याप्रतिष्ठानात्प्रतितिष्ठत्यानन्दे परमे ब्रह्मणि ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः ।

दृष्टं च फलं तस्योच्यते— अन्नवान्प्रभूतमन्नमस्य विद्यत


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]

द्वारा ही सबकी अपेक्षा अन्तरतम आनन्दको ब्रह्म जाना । अतः जो ब्रह्मको जाननेकी इच्छावाला हो उसे साधनरूपसे बाह्य इन्द्रिय और अन्तःकरणका समाधानरूप परम तप ही करना चाहिये—यह इस प्रकरणका तात्पर्य है ।

अब आख्यायिकासे निवृत्त होकर श्रुति अपने ही वाक्यसे आख्यायिका- से निष्पन्न होनेवाला अर्थ बतलाती है—अन्नमय आत्मासे प्रारम्भ हुई यह भार्गवी—भृगुकी जानी हुई और वारुणी—वरुणकी कही हुई विद्या परमाकाशमें—हृदयाकाशस्थित गुहा- के भीतर अद्वैत परमानन्दमें प्रतिष्ठित है अर्थात् वहीं इसका पर्यवसान होता है । इसी प्रकार जो कोई दूसरा पुरुष भी इसी क्रमसे तपरूप साधनके द्वारा क्रमशः अनुप्रवेश करके आनन्दको ब्रह्मरूपसे जानता है वह इस प्रकार विद्यामें स्थिति लाभ करनेसे आनन्द अर्थात् परब्रह्ममें स्थिति प्राप्त करता है, यानी ब्रह्म ही हो जाता है ।

अब उसका दृष्ट ( इस लोकमें प्राप्त होनेवाला ) फल बतलाया जाता है—अन्नवान्—जिसके पास


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अनु० ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २२५

इत्यन्नवान् । सत्तामात्रेण तु | बहुत-सा अन्न हो उसे अन्नवान् | कहते हैं।* अन्नकी सत्तामात्रसे तो सर्वो ह्यन्नवानिति विद्याया | सभी अन्नवान् हैं, अतः [यदि उस | प्रकार अर्थ किया जाय तो] विशेषो न स्यात् । एवमन्नमत्ती- | विद्याकी कोई विशेषता नहीं रहती। | इसी प्रकार वह अन्नाद-जो अन्नभक्षण त्यन्नादो दीप्ताग्निर्भवतीत्यर्थः । | करे यानी दीप्ताग्नि हो जाता है। वह महान्भवति । केन महत्त्वमित्यत | महान् हो जाता है। उसका महत्त्व | किस कारणसे होता है ? इसपर आह--प्रजया पुत्रादिना पशु- | कहते हैं-पुत्रादि प्रजा, गौ, अश्व | आदि पशु तथा ब्रह्मतेज यानी शम, भिर्गवाश्वादिभिर्ब्रह्मवर्चसेन शम- | दम एवं ज्ञानादिके कारण होनेवाले दमज्ञानादिनिमित्तेन तेजसा । | तेजसे तथा कीर्ति यानी शुभाचरणके | कारण होनेवाली ख्यातिसे वह महान्भवति कीर्त्या ख्यात्या | महान् हो जाता है ॥ १ ॥ शुभप्रचारनिमित्तया ॥१॥ इति भृगुवल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥६॥

  • मूलमें केवल 'अन्नवान्' है, भाष्यमें उसका अर्थ 'प्रभूत (बहुतसे) अन्नवाला' किया गया है। इससे यह शंका होती है कि 'प्रभूत' विशेषणका प्रयोग क्यों किया गया। इसीका समाधान करनेके लिये आगेका वाक्य है। तै० उ० २९-३०- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

सप्तम अनुवाक अन्नकी निन्दा न करनारूप व्रत तथा शरीर और प्राणरूप अन्न- ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥१॥ अन्नकी निन्दा न करे। यह ब्रह्मज्ञका व्रत है। प्राण ही अन्न है और शरीर अन्नाद है। प्राणमें शरीर स्थित है और शरीरमें प्राण स्थित है। इस प्रकार [ एक दूसरेके आश्रित होनेसे वे एक दूसरेके अन्न हैं; अतः ] ये दोनों अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित ( प्रख्यात ) होता है, अन्नवान् और अन्नभोक्ता होता है। प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥

किं चान्नेन द्वारभूतेन ब्रह्मइसके सिवा क्योंकि द्वारभूत
विज्ञातं यस्मात्तस्माद्गुरुमिवअन्नके द्वारा ही ब्रह्मको जाना है इसलिये गुरुके समान अन्नकी भी
अन्नं न निन्द्यात्तदस्यैवं ब्रह्म-निन्दा न करे। इस प्रकार ब्रह्म-वेत्ताके लिये यह व्रत उपदेश किया
विदो व्रतमुपदिश्यते । व्रतोप-जाता है। यह व्रतका उपदेश

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अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७ देशोऽन्नस्तुतये, स्तुतिभाक्त्वं | अन्नकी स्तुतिके लिये है और अन्नकी | स्तुतिपात्रता ब्रह्मोपलब्धिका साधन चान्नस्य ब्रह्मोपलब्ध्युपायत्वात् । | होनेके कारण है । प्राणो वा अन्नम्, शरीरान्त- | प्राण ही अन्न है; क्योंकि प्राण र्भावात्प्राणस्य । यद्यस्यान्तः- | शरीरके भीतर रहनेवाला है । जो प्रतिष्ठितं भवति तत्तस्यान्नं भव- | जिसके भीतर स्थित रहता है वह तीति । शरीरे च प्राणः प्रति- | उसका अन्न हुआ करता है । प्राण ष्ठितस्तस्मात्प्राणोऽन्नं शरीरमन्ना- | शरीरमें स्थित है, इसलिये प्राण दम् । तथा शरीरमप्यन्नं प्राणो- | अन्न है और शरीर अन्नाद है । ऽन्नादः । कस्मात् ? प्राणे शरीरं | इसी प्रकार शरीर भी अन्न है और प्रतिष्ठितम्; तन्निमित्तत्वाच्छरी- | प्राण अन्नाद है; कैसे ?—प्राणमें रस्थितेः । तस्मात्तदेतदुभयं शरीरं | शरीर स्थित है; क्योंकि शरीरकी प्राणश्चान्न मन्नादश्च । येनान्योन्य- | स्थिति प्राणके ही कारण है अतः स्मिन्प्रतिष्ठितं तेनान्नम् । येना- | ये दोनों शरीर और प्राण अन्न और न्योन्यस्य प्रतिष्ठा तेनान्नादः । | अन्नाद हैं; क्योंकि वे एक दूसरेमें तस्मात्प्राणः शरीरं चोभयमन्न- | स्थित हैं इसलिये अन्न हैं और मन्नादं च । | क्योंकि एक दूसरेके आधार हैं | इसलिये अन्नाद हैं । अतएव प्राण | और शरीर दोनों ही अन्न और | अन्नाद हैं । स य एवमेतदन्नमन्ने प्रति- | वह जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें ष्ठितं वेद प्रतितिष्ठत्यन्नादा- | स्थित जानता है, अन्न और अन्नाद- त्मनैव । किं चान्नवानन्नादो भव- | रूपसे ही स्थित होता है तथा अन्न- तीत्यादि पूर्ववत् ॥१॥ | वान् और अन्नाद होता है—इत्यादि | शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १ ॥ इति भृगुवल्ल्यां सप्तमोऽनुवाकः ॥७॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अष्टम अनुवाक अन्नका त्याग न करना Schneider/व्रत तथा जल और ज्योतिरूप अन्न-ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन अन्नं न परिचक्षीत। तद्व्रतम्। आपो वा अन्नम्। ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्न- मन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान्कीर्त्या ॥१॥ अन्नका त्याग न करे। यह व्रत है। जल ही अन्न है। ज्योति अन्नाद है। जलमें ज्योति प्रतिष्ठित है और ज्योतिमें जल स्थित है। इस प्रकार ये दोनों अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित होता है, अन्नवान् और अन्नाद होता है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥ अन्नं न परिचक्षीत न परि- | अन्नका प्रत्याख्यान अर्थात् त्याग | न करे, यह व्रत है—यह कथन हरेत्। तद्व्रतं पूर्ववत्स्तुत्यर्थम्। | पूर्ववत् स्तुतिके लिये है। इस | प्रकार शुभाशुभकी कल्पनासे उपेक्षा तदेवं शुभाशुभकल्पनया अपरि- | न किया हुआ अन्न ही यहाँ स्तुत हियमाणं स्तुतं महीकृतमन्नं स्यात्। | एवं महिमान्वित किया जाता है। एवं यथोक्तमुत्तरेष्वप्यापो वा | तथा आगेके 'आपो वा अन्नम्' | इत्यादि वाक्योंमें भी पूर्वोक्त अर्थकी अन्नमित्यादिषु योजयेत् ॥१॥ | ही योजना करनी चाहिये ॥१॥ इति भृगुवल्ल्यामष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

नवम अनुवाक अन्नसञ्चयरूप व्रत तथा पृथिवी और आकाशरूप अन्न-ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन अन्नं बहु कुर्वीत । तद्व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम् । आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान्कीर्त्या ॥ १ ॥ अन्नको बढ़ावे--यह व्रत है। पृथिवी ही अन्न है। आकाश अन्नाद है। पृथिवीमें आकाश स्थित है और आकाशमें पृथिवी स्थित है। इस प्रकार ये दोनों अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित होता है, अन्नवान् और अन्नाद होता है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥ अप्सु ज्योतिरित्यब्ज्योति- | पूर्वोक्त 'अप्सु ज्योतिः' आदि मन्त्रके अनुसार जल और ज्योतिकी अन्न और अन्नाद गुणसे उपासना षोरन्नान्नादगुणत्वेनोपासकस्या- | करनेवालेके लिये 'अन्नको बढ़ाना व्रत है' [-यह बात इस मन्त्रमें न्नस्य बहुकरणं व्रतम् ॥ १ ॥ | कही गयी है] ॥ १ ॥ इति भृगुवल्ल्यां नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

दशम अनुवाक गृहागत अतिथिको आश्रय और अन्न देनेका विधान एवं उससे प्राप्त होनेवाला फल; तथा प्रकारान्तरसे ब्रह्मकी उपासनाका वर्णन न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षीत । तद्व्रतम् । तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् । अराध्यस्मा अन्न- मित्याचक्षते । एतद्वै मुखतोऽन्नꣳराद्धम् । मुखतोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वै मध्यतोऽन्नꣳराद्धम् । मध्यतो- ऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वा अन्ततोऽन्नꣳराद्धम् । अन्ततोऽस्मा अन्नꣳराध्यते ॥ १ ॥ य एवं वेद । क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः । कर्मेति हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः । तृप्तिरिति वृष्टौ । बलमिति विद्युति ॥ २ ॥ यश इति पशुषु ज्योतिरिति नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृत- मानन्द इत्युपस्थे । सर्वमित्याकाशे । तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठावान् भवति । तन्मह इत्युपासीत । महान् भवति । तन्मन इत्युपासीत । मानवान् भवति ॥ ३ ॥ तन्नम इत्युपासीत । नम्यन्तेऽस्मै कामाः । तद्ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्मवान् भवति । तद्ब्रह्मणः परिमर CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३१ इत्युपासीत । पर्यैणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः । परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः । स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः ॥ ४ ॥ अपने यहाँ रहनेके लिये आये हुए किसीका भी परित्याग न करे। यह व्रत है । अतः किसी-न-किसी प्रकारसे बहुत-सा अन्न प्राप्त करे; क्योंकि वह (अन्नोपासक) उस (गृहगत अतिथि) से 'मैंने अन्न तैयार किया है' ऐसा कहता है । जो पुरुष मुख्यतः (प्रथम अवस्थामें अथवा मुख्यवृत्तिसे यानी सत्कारपूर्वक) सिद्ध किया हुआ अन्न देता है उसे मुख्यवृत्तिसे ही अन्नकी प्राप्ति होती है । जो मध्यतः (मध्यम आयुमें अथवा मध्यम वृत्तिसे) सिद्ध किया हुआ अन्न देता है उसे मध्यम वृत्तिसे ही अन्नकी प्राप्ति होती है । तथा जो अन्ततः (अन्तिम अवस्थामें अथवा निकृष्ट वृत्तिसे) सिद्ध किया हुआ अन्न देता है उसे निकृष्ट वृत्तिसे ही अन्न प्राप्त होता है ॥ १ ॥ जो इस प्रकार जानता है [उसे पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है । अब आगे प्रकारन्तरसे ब्रह्मकी उपासनाका वर्णन किया जाता है—] ब्रह्म वाणीमें क्षेम (प्राप्त वस्तुके परिरक्षण) रूपसे [स्थित है—इस प्रकार उपासनीय है], योगक्षेमरूपसे प्राण और अपानमें, कर्मरूपसे हाथोंमें, गतिरूपसे चरणोंमें और त्यागरूपसे पायुमें [उपासनीय है], यह मनुष्यसम्बन्धिनी उपासना है । अब देवताओंसे सम्बन्धित उपासना कही जाती है—तृप्तिरूपसे वृष्टिमें, बलरूपसे विद्युत्में ॥ २ ॥ यशोरूपसे पशुओंमें, ज्योतिरूपसे नक्षत्रोंमें, पुत्रादि प्रजा, अमृतत्व और आनन्दरूपसे उपस्थमें तथा सर्वरूपसे आकाशमें [ब्रह्मकी उपासना करे]। वह ब्रह्म सबका प्रतिष्ठा (आधार) है—इस भावसे उसकी उपासना करे। इससे उपासक प्रतिष्ठावान् होता है । वह महः [नामक व्याहृति अथवा तेज] है—इस भावसे उसकी उपासना करे। इससे उपासक महान् होता है । वह मन है—इस प्रकार उपासना करे । इससे उपासक मानवान् (मनन करनेमें समर्थ) होता है ॥ ३ ॥ वह नमः है—इस CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

२३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३ भावसे उसकी उपासना करे। इससे सम्पूर्ण काम्य पदार्थ उसके प्रति विनम्र हो जाते हैं। वह ब्रह्म है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। इससे वह ब्रह्मनिष्ठ होता है। वह ब्रह्मका परिमर (आकाश) है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। इससे उससे द्वेष करनेवाले उसके प्रति- पक्षी मर जाते हैं, तथा जो अप्रिय भ्रातृव्य (भाईके पुत्र) होते हैं वे भी मर जाते हैं। वह, जो कि इस पुरुषमें है और वह जो इस आदित्यमें है, एक है ॥ ४ ॥

तथा पृथिव्याकाशोपासकस्य | तथा पृथिवी और आकाशकी आतिथ्योपदेशः वसतौ वसतिनि- | [ अन्न एवं अन्नादरूपसे ] उपासना मित्तं कंचन कंचि- | करनेवालेके यहाँ रहनेके लिये कोई दपि न प्रत्याचक्षीत वसत्यर्थ- | भी आवे उसे उसका परित्याग नहीं मागतं न निवारयेदित्यर्थः । | करना चाहिये। अर्थात् अपने यहाँ वासे च दत्तेऽवश्यं ह्यशनं दात- | निवास करनेके लिये आये हुए व्यम् । तस्माद्यया कया च | किसी भी व्यक्तिका वह निवारण विधया येन केन च प्रकारेण | न करे। जब किसीको रहनेका बह्वन्नं प्राप्नुयाद्बह्वन्नसंग्रहं | स्थान दिया जाय तो उसे भोजन भी कुर्यादित्यर्थः । | अवश्य देना चाहिये । अतः जिस- | किसी भी विधिसे यानी किसी-न- | किसी प्रकार बहुत-सा अन्न प्राप्त | करे; अर्थात् खूब अन्न-संग्रह करे।

यस्मादन्नवन्तो विद्वांसोऽभ्या- | क्योंकि अन्नवान् उपासकगण गतायान्नार्थिनेऽराधि संसिद्ध- | अपने यहाँ आये हुए अन्नार्थीसे मष्मा अन्नमित्याचक्षते न | 'अन्न तैयार है' ऐसा कहते हैं- नास्तीति प्रत्याख्यानं कुर्वन्ति । | 'अन्न नहीं है' ऐसा कहकर उसका तस्माच्च हेतोर्बह्वन्नं प्राप्नुयादिति | परित्याग नहीं करते। इसलिये भी पूर्वेण संबन्धः । अपि चान्ना- | बहुत-सा अन्न उपार्जन करे—इस | प्रकार इसका पूर्ववाक्यसे सम्बन्ध

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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३३ [संस्कृत-मूल/भाष्य] नस्य माहात्म्यमुच्यते । यथा । यत्कालं प्रयच्छत्यन्नं तथा तत्कालमेव प्रत्युपनमते । कथ- मिति तदेतदाह— एतद्वा अन्नं मुखतो मुख्ये [हाशिया: वृत्तिभेदेनान्न-दानस्य फलभेदः] प्रथमे वयसि मु- ख्यया वा वृत्त्या पूजापुरःसरमभ्यागतायान्नार्थिने राद्धं संसिद्धं प्रयच्छतीति वाक्य- शेषः । तस्य किं फलं स्यादि- त्युच्यते—मुखतः पूर्वे वयसि मुख्यया वा वृत्त्यास्मा अन्नादा- यान्नं राध्यते यथादत्तमुपतिष्ठत इत्यर्थः । एवं मध्यतो मध्यमे वयसि मध्यमेन चोपचारेण । तथाऽन्ततोऽन्ते वयसि जघन्येन चोपचारेण परिभवेन तथैवास्मै राध्यते संसिध्यत्यन्नम् ॥ १ ॥ य एवं वेद य एवमन्नस्य यथोक्तं माहात्म्यं वेद तद्दानस्य च फलम्, तस्य यथोक्तं फल- मुपनमते । [भाष्यार्थ / हिन्दी अनुवाद] है । अब अन्नदानका माहात्म्य कहा जाता है—जो पुरुष जिस प्रकार और जिस समय अन्न-दान करता है उसे उसी प्रकार और उसी समय उसकी प्राप्ति होती है । ऐसा किस प्रकार होता है ? सो बतलाते हैं— जो पुरुष मुखतः—मुख्य—प्रथम अवस्थामें अथवा मुख्य वृत्तिसे यानी सत्कारपूर्वक राद्ध अर्थात् सिद्ध (पक्व) अन्नको अपने यहाँ आये हुए अन्नार्थी अतिथिको देता है— यहाँ प्रयच्छति (देता है) यह क्रियापद वाक्यशेष (अनुक्त अंश) है—उसे क्या फल मिलता है, सो बतलाया जाता है—इस अन्नदाताको मुखतः—प्रथम अवस्थामें अथवा मुख्य वृत्तिसे अन्न प्राप्त होता है; अर्थात् जिस प्रकार दिया जाता है उसी प्रकार प्राप्त होता है । इसी प्रकार मध्यतः मध्यम आयुमें अथवा मध्यम वृत्तिसे तथा अन्ततः—अन्तिम आयुमें अथवा निकृष्ट वृत्तिसे यानी तिरस्कारपूर्वक देनेसे इसे उसी प्रकार अन्नकी प्राप्ति होती है ॥१॥ जो इस प्रकार जानता है—जो इस प्रकार अन्नका पूर्वोक्त माहात्म्य और उसके दानका फल जानता है उसे पूर्वोक्त फलकी प्राप्ति होती है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

[संस्कृत-भाष्यम् / Left Column]

[पार्श्व-टिप्पणी:] ब्रह्मोपासन-प्रकारान्तराणि 'मानुषी समाज्ञा'

इदानीं ब्रह्मण उपासनप्रकार उच्यते--क्षेम इति वाचि । क्षेमो ना- मोपात्तपरिरक्षणम् । ब्रह्म वाचि क्षेमरूपेण प्रतिष्ठित- मित्युपास्यम् । योगक्षेम इति, योगोऽनुपात्तस्योपादानम्, तौ हि योगक्षेमौ प्राणापानयोः सतो- र्भवतो यद्यपि तथापि न प्राणा- पाननिमित्तावेव किं तर्हि ब्रह्म- निमित्तौ; तस्माद्ब्रह्म योगक्षेमा- त्मना प्राणापानयोः प्रतिष्ठित- मित्युपास्यम् । एवमुत्तरेष्वन्येषु तेन तेना- त्मना ब्रह्मैवोपास्यम् । कर्मणो ब्रह्मनिर्वर्त्यत्वाद्धस्तयोः कर्मा- त्मना ब्रह्म प्रतिष्ठितमित्युपा- स्यम् । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इत्येता मानुषीर्मनुष्येषु भवा मानुष्यः


[हिन्दी-अनुवाद / Right Column]

अब ब्रह्मकी उपासनाका [ एक और ] प्रकार बतलाया जाता है— 'क्षेम है' इस प्रकार वाणीमें । प्राप्त पदार्थकी रक्षा करनेका नाम 'क्षेम' है । वाणीमें ब्रह्म क्षेमरूपसे स्थित है—इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये । 'योगक्षेम'—अप्राप्त वस्तुका प्राप्त करना 'योग' कहलाता है । वे योग और क्षेम यद्यपि बलवान् प्राण और अपानके रहते हुए ही होते हैं, तो भी उनका कारण प्राण एवं अपान ही नहीं है । तो उनका कारण क्या है ? वे ब्रह्मके कारण ही होते हैं । अतः योगक्षेमरूपसे ब्रह्म प्राण और अपान- में स्थित है—इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये । इसी प्रकार आगेके अन्य पर्यायों- में भी उन-उनके रूपसे ब्रह्मकी ही उपासना करनी चाहिये । कर्म ब्रह्मकी ही प्रेरणासे निष्पन्न होता है; अतः हाथोंमें ब्रह्म कर्मरूपसे स्थित है—इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये । चरणोंमें गतिरूपसे और पायुमें विसर्जनरूपसे [ प्रतिष्ठित समझकर उसकी उपासना करे ] । इस प्रकार यह मानुषी—मनुष्योंमें


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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३५ ❖ ─── ❖ ─── ❖ ─── ❖ ─── ❖ ─── ❖ ─── ❖ ─── ❖ समाज्ञाः, आध्यात्मिक्यः समाज्ञा | रहनेवाली समाज्ञा है, अर्थात् यह ज्ञानानि विज्ञानान्युपासनानी- | आध्यात्मिक समाज्ञा-ज्ञान-विज्ञान त्यर्थः । | यानी उपासना है-यह इसका तात्पर्य है । अथानन्तरं दैवीर्दैवत्यो देवेषु | अब इसके पश्चात् दैवी-देव- 'दैवी समाज्ञा' भवाः समाज्ञा उ- | सम्बन्धिनी अर्थात् देवताओंमें होने- च्यन्ते । तृप्तिरिति | वाली समाज्ञा कही जाती है । तृप्ति वृष्टौ । वृष्टेरन्नादिद्वारेण तृप्ति- | इस भावसे वृष्टिमें [ ब्रह्मकी उपासना हेतुत्वाद्व्रह्मैव तृप्त्यात्मना वृष्टौ | करे ] । अन्नादिके द्वारा वृष्टि तृप्ति- व्यवस्थितमित्युपास्यम् । तथान्येषु | का कारण है । अतः तृप्तिरूपसे तेन तेनात्मना ब्रह्मैवोपास्यम् । | ब्रह्म ही वृष्टिमें स्थित है-इस प्रकार तथा बलरूपेण विद्युति ॥ २ ॥ | उसकी उपासना करनी चाहिये । यशोरूपेण पशुषु । ज्योतीरूपेण | इसी प्रकार अन्य पर्यायोंमें भी उन- नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतममृतत्व- | उनके रूपसे ब्रह्मकी ही उपासना प्राप्तिः पुत्रेण ऋणविमोक्षद्वारेणा- | करनी चाहिये । अर्थात् बलरूपसे नन्दः सुखमित्येतत्सर्वमुपस्थनि- | विद्युत्में ॥ २ ॥ यशरूपसे पशुओंमें, मिक्तं ब्रह्मैवानेनात्मनोपस्थे प्रति- | ज्योतिरूपसे नक्षत्रोंमें, प्रजाति ष्ठितमित्युपास्यम् । | ( पुत्रादि प्रजा ) अमृत-अर्थात् पुत्र- सर्वं ह्याकाशे प्रतिष्ठितमतो | द्वारा पितृऋणसे मुक्त होनेके द्वारा यत्सर्वमाकाशे तद्ब्रह्मैवेत्युपास्यम् । | अमृतत्वकी प्राप्ति और आनन्द-सुख तच्चाकाशं ब्रह्मैव । तस्मात्तत् | ये सब उपस्थके निमित्तसे ही | होनेवाले हैं; अतः इनके रूपसे | ब्रह्म ही उपस्थमें स्थित है-इस प्रकार | उसकी उपासना करनी चाहिये । | सब कुछ आकाशमें ही स्थित | है । अतः आकाशमें जो कुछ है | वह सब ब्रह्म ही है-इस प्रकार | उसकी उपासना करनी चाहिये । | तथा वह आकाश भी ब्रह्म ही है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

२३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३


[मूल एवं संस्कृत-टीका]

सर्वस्य प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठा- गुणोपासनात्प्रतिष्ठावान्भवति । एवं पूर्वेष्वपि यद्यत्तदधीनं फलं तद्ब्रह्मैव तदुपासनात्तद्वान्भवतीति द्रष्टव्यम् । श्रुत्यन्तराच्च—"तं यथा यथोपासते तदेव भवति" इति । तन्मह इत्युपासीत । महो महत्त्वगुणवत्तदुपासीत । महान् भवति । तन्मन इत्युपासीत । मननं मनः । मानवान्भवति मननसमर्थो भवति ॥ ३॥ तन्नम इत्युपासीत । नमनं नमो नमन- गुणवत्तदुपासीत । नम्यन्ते प्रह्ली- भवन्त्यस्मा उपासित्रे कामाः काम्यन्त इति भोग्या विषया इत्यर्थः ।


[हिन्दी अनुवाद]

अतः वह सबकी प्रतिष्ठा (आश्रय) है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। प्रतिष्ठा गुणवान् ब्रह्मकी उपासना करनेसे उपासक प्रतिष्ठावान् होता है । ऐसा ही पूर्व सब पर्यायोंमें समझना चाहिये । जो-जो उसके अधीन फल है वह ब्रह्म ही है । उसकी उपासनासे पुरुष उसी फलसे युक्त होता है—ऐसा जानना चाहिये। यही बात “जिस-जिस प्रकार उसकी उपासना करता है वह (उपासक) वही हो जाता है" इस एक दूसरी श्रुतिसे प्रमाणित होती है । वह महः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । महः अर्थात् महत्त्व गुणवाला है—ऐसे भावसे उसकी उपासना करे । इससे उपासक महान् हो जाता है । वह मन है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। मननका नाम मन है । इससे वह मानवान्—मननमें समर्थ हो जाता है ॥३॥ वह नमः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । नमनका नाम ‘नमः’ है अर्थात् उसे नमन-गुणवान् समझकर उपासना करे । इससे उस उपासकके प्रति सम्पूर्ण काम—जिनकी कामना की जाय वे भोग्य विषय नत अर्थात् विनम्र हो जाते हैं ।


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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३७

तद्ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्म परि- | वह ब्रह्म है-इस प्रकार उसकी वृढतममित्युपासीत । ब्रह्मवांस्तद्- | उपासना करे । ब्रह्म यानी सबसे गुणो भवति । तद्ब्रह्मणः परिमर | बढ़ा हुआ है-इस प्रकार उपासना इत्युपासीत । ब्रह्मणः परिमरः | करे । इससे वह ब्रह्मवान्-ब्रह्मके-से परिम्रियन्तेऽस्मिन्पञ्च देवता | गुणवाला हो जाता है । वह ब्रह्मका विद्युद्वृष्टिश्चन्द्रमा आदि- | परिमर है-इस प्रकार उसकी त्योऽग्निरित्येताः । अतो वायुः | उपासना करे । ब्रह्मका परिमर- परिमरः श्रुत्यन्तरप्रसिद्धेः । स | जिसमें विद्युत्, वृष्टि, चन्द्रमा, आदित्य एष एवार्थं वायुराकाशेनानन्य | और अग्नि-ये पाँच देवता मृत्युको इत्याकाशो ब्रह्मणः परिमरः | प्राप्त होते हैं उसे परिमर कहते हैं; तमाकाशं वाय्वात्मानं ब्रह्मणः | अतः वायु ही परिमर है, जैसा कि परिमर इत्युपासीत । | [ "वायुर्वाव संवर्गः" इस ] एक | अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है । वही एनमेवंविदं प्रतिस्पर्धिनो | यह वायु आकाशसे अभिन्न है, इसलिये द्विषन्तोऽद्विषन्तोऽपि सपत्ना यतो | आकाश ही ब्रह्मका परिमर है । अतः भवन्त्यतो विशेष्यन्ते द्विषन्तः | वायुरूप आकाशकी 'यह ब्रह्मका सपत्ना इति, एनं द्विषन्तः | परिमर है' इस भावसे उपासना करे । सपत्नास्ते परिम्रियन्ते प्राणाञ्ज- | हति । किं च ये चाप्रिया अस्य | इस प्रकार जाननेवाले इस भ्रातृव्या अद्विषन्तोऽपि ते च | उपासकके द्वेष करनेवाले प्रतिपक्षी- परिम्रियन्ते । | क्योंकि प्रतिपक्षी द्वेष न करनेवाले | भी होते हैं इसलिये यहाँ 'द्वेष | करनेवाले' यह विशेषण दिया गया | है-मर जाते हैं अर्थात् प्राण त्याग | देते हैं । तथा इसके जो अप्रिय | भ्रातृव्य होते हैं वे, द्वेष करनेवाले | न होनेपर भी, मर जाते हैं ।

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२३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

२३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

[वाम स्तम्भ - संस्कृत] 'प्राणो वा अन्नं शरीरमन्ना- दमू' इत्यारभ्याका- शान्तस्य कार्यस्यै- वान्नान्नादत्वमुक्तम् । उक्तं नाम किं तेन ? तेनैतत्सिद्धं भवति—कार्य- विषय एव भोज्यभोक्तृत्वकृतः संसारो न त्वात्मनीति । आत्मनि तु भ्रान्त्योपचर्यते । नन्वात्मापि परमात्मनः कार्यं ततो युक्तस्तस्य संसार इति । न; असंसारिण एव प्रवेश- श्रुतेः । “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्रावि- शत्” ( तै० उ० २ । ६ । १ ) इत्याकाशादिकारणस्य ह्यसंसा- रिण एव परमात्मनः कार्येष्वनु- प्रवेशः श्रूयते । तस्मात्कार्यानु- प्रविष्टो जीव आत्मा पर एव असंसारी । सृष्ट्वानुप्राविशदिति समानकर्तृकत्वोपपत्तेश्च । सर्ग- [हाशिये में टिप्पणी: आत्मनोऽसंसारित्वस्थापनम्]


[दक्षिण स्तम्भ - हिन्दी] 'प्राण ही अन्न है और शरीर अन्नाद है' यहाँसे लेकर आकाशपर्यन्त कार्यवर्गका ही अन्न और अन्नादत्व प्रतिपादन किया गया है । पूर्व०—कहा गया है—सो इससे क्या हुआ ? सिद्धान्ती—इससे यह सिद्ध होता है कि भोज्य और भोक्ताके कारण होनेवाला संसार कार्यवर्गसे ही सम्बन्धित है, वह आत्मामें नहीं है; आत्मामें तो भ्रान्तिवश उसका उपचार किया जाता है । पूर्व०—परन्तु आत्मा भी तो परमात्माका कार्य है । इसलिये उसे संसारकी प्राप्ति होना उचित ही है । सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि प्रवेश- श्रुति असंसारीका ही प्रवेश प्रति- पादन करती है । “उसे रचकर वह पीछेसे उसीमें प्रविष्ट हो गया” इस श्रुतिद्वारा आकाशादिके कारणरूप असंसारी परमात्माका ही कार्योंमें अनुप्रवेश सुना गया है । अतः कार्यमें अनुप्रविष्ट जीवात्मा असंसारी परमात्मा ही है । 'रचकर पीछेसे प्रविष्ट हो गया' इस वाक्यसे एक ही कर्ता होना सिद्ध होता है । यदि

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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९ प्रवेशक्रिययोश्चैकश्चेत्कर्ता ततः | सृष्टि और प्रवेशक्रियाका एक ही क्त्वाप्रत्ययो युक्तः । | कर्त्ता होगा तभी ‘क्त्वा’ प्रत्यय होना | युक्त होगा । प्रविष्टस्य तु भावान्तरापत्ति- | पूर्व०–प्रवेश कर लेनेपर उसे रिति चेत् ? | दूसरे भावकी प्राप्ति हो जाती है– | ऐसा माने तो ? न; प्रवेशस्यान्यार्थत्वेन | सिद्धान्ती–नहीं, क्योंकि प्रवेश- | का प्रयोजन दूसरा ही है–ऐसा प्रत्याख्यातत्वात् । “अनेन जीवे- | कहकर हम इसका पहले ही | निराकरण कर चुके हैं ।* यदि नात्मना” (छा० उ० ६ । ३ | कहो कि “अनेन जीवेन आत्मना” २) इति विशेषश्रुतेर्धर्मान्तरेणा- | इत्यादि विशेष श्रुति होनेके कारण | उसका धर्मान्तररूपसे ही प्रवेश नुप्रवेश इति चेत् ? न; “तत्त्वमसि” | होता है–तो ऐसा कहना ठीक नहीं; | क्योंकि “वह तू है” इस श्रुतिद्वारा इति पुनस्तद्भावोक्तेः । भावा- | पुनः उसकी तद्रूपताका वर्णन किया | गया है। और यदि कहो कि भावान्तर- न्तरापन्नस्यैव तदपोहार्था संप- | को प्राप्त हुए ब्रह्मके उस भावका | निषेध करनेके लिये ही वह केवल दिति चेत् ? न; “तत्सत्यं स | दृष्टिमात्र कही गयी है तो ऐसी बात | भी नहीं है; क्योंकि “वह सत्य है, आत्मा तत्त्वमसि” (छा० उ० | वह आत्मा है, वह तू है” इत्यादि | श्रुतिसे उसका परमात्माके साथ ६ । ८–१६) इति सामानाधि- | सामानाधिकरण्य सिद्ध होता है । करण्यात् । | दृष्टं जीवस्य संसारित्वमिति | पूर्व०–जीवका संसारित्व तो चेत् ? | स्पष्ट देखा है ।

  • देखिये ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक ६ का भाष्य । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

२४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

न; उपलब्धुरनुपलभ्यत्वात् । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि जो | ( जीव ) सबका द्रष्टा है वह देखा | नहीं जा सकता । संसारधर्मविशिष्ट आत्मोप- | पूर्व०—सांसारिक धर्मोंसे युक्त लभ्यत इति चेत् ? | आत्मा तो उपलब्ध होता ही है ? न; धर्माणां धर्मिणोऽव्यति- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; | क्योंकि धर्म अपने धर्मीसे अभिन्न रेकात्कर्मत्वानुपपत्तेः, उष्णप्र- | होते हैं अतः वे उसके कर्म नहीं | हो सकते, जिस प्रकार कि [ सूर्यके काशयोर्दाह्यप्रकाश्यत्वानुपपत्ति- | धर्म ] उष्ण और प्रकाशका दाह्यत्व | और प्रकाश्यत्व सम्भव नहीं है । वत् । त्रासादिदर्शनाद्दुःखित्वा- | यदि कहो कि भय आदि देखनेसे | आत्माके दुःखित्व आदिका अनुमान द्यनुमीयत इति चेत् ? न; त्रासा- | होता ही है—तो ऐसा कहना भी | ठीक नहीं; क्योंकि भय आदि दुःख देर्दुःखस्य चोपलभ्यमानत्वान्नो- | उपलब्ध होनेवाले होनेके कारण | उपलब्ध करनेवाले [ आत्मा ] के पलब्धृधर्मत्वम् । | धर्म नहीं हो सकते । कापिलकाणादादितर्कशास्त्र- | पूर्व०—परन्तु ऐसा माननेसे तो | कपिल और कणाद आदिके तर्क- विरोध इति चेत् ? | शास्त्रसे विरोध आता है । न; तेषां मूलाभावे वेद- | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक | नहीं; क्योंकि उनका कोई आधार विरोधे च भ्रान्तत्वोपपत्तेः । | न होनेसे और वेदसे विरोध होनेसे | भ्रान्तिमय होना उचित ही है । श्रुति श्रुत्युपपत्तिभ्यां च सिद्धमात्म- | और युक्तिसे आत्माका असंसारित्व | सिद्ध होता है तथा एक होनेके नोऽसंसारित्वमेकत्वाच्च । | कारण भी ऐसा ही जान पड़ता है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१ कथमेकत्वमित्युच्यते-स यश्चायं | उसका एकत्व कैसे है ? सो सबका पुरुषे यश्चासावादित्ये स | सब पूर्ववत् 'वह जो कि इस पुरुषमें है और जो यह आदित्यमें एक इत्येवमादि पूर्ववत् | है एक है,' इस वाक्यद्वारा सर्वम् ॥४॥ | बतलाया गया है ॥४॥ आदित्य और देहोपाधिक चेतनकी एकता जाननेवाले उपासकको मिलनेवाला फल स य एवंवित् । अस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमय- मात्मानमुपसंक्रम्य । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं विज्ञानमयमात्मान- मुपसंक्रम्य । एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्य । इमाँ- ल्लोकान्कामान्नी कामरूप्यनुसंचरन् । एतत्साम गायन्नास्ते । हा ३ वु हा ३ वु हा ३ वु ॥ ५ ॥ वह जो इस प्रकार जाननेवाला है इस लोक (दृष्ट और अदृष्ट विषय-समूह) से निवृत्त होकर इस अन्नमय आत्माके प्रति संक्रमण कर, इस प्राणमय आत्माके प्रति संक्रमण कर, इस मनोमय आत्माके प्रति संक्रमण कर, इस विज्ञानमय आत्माके प्रति संक्रमण कर तथा इस आनन्दमय आत्माके प्रति संक्रमण कर इन लोकोंमें कामान्नी (इच्छा- नुसार भोग भोगता हुआ) और कामरूपी होकर (इच्छानुसार रूप धारण कर) विचरता हुआ यह सामगान करता रहता है—हा ३ वु हा ३ वु हा ३ वु ॥ ५ ॥ तै० उ० ३१- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

२४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३ अन्नमयादिक्रमेणानन्दमयमा- अन्नमय आदिके क्रमसे आनन्द- त्मानमुपसंक्रम्यैतत्साम गाय- मय आत्माके प्रति संक्रमण कर वह न्नास्ते। यह सामगान करता रहता है। सत्यं ज्ञानमित्यस्या ऋचोऽर्थो 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस सोऽश्नुते व्याख्यातो विस्त- ऋचाके अर्थकी, इसकी विवरणभूता सर्वान्कामानिति रेण तद्विवरणभूत- ब्रह्मानन्दवल्लीके द्वारा विस्तारपूर्वक मीमांस्यते यानन्दवल्लया । व्याख्या कर दी गयी थी। किन्तु उसके फलका निरूपण करनेवाले “सोऽश्नुते सर्वान्कामान्सह “वह सर्वज्ञ ब्रह्मस्वरूपसे एक साथ ब्रह्मणा विपश्चिता” (तै० उ० सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्त कर लेता है” इस वचनके अर्थका विस्तारपूर्वक २।१।१) इति तस्यफलवचन- वर्णन नहीं किया गया था। वे भोग क्या हैं? उनका किन स्यार्थविस्तारो नोक्तः। के ते विषयोंसे सम्बन्ध है? और किस किंविषया वा सर्वे कामाः कथं प्रकार वह उन्हें ब्रह्मरूपसे एक साथ ही प्राप्त कर लेता है?—यह वा ब्रह्मणा सह समश्नुत इत्येत- सब बतलाना है, अतः अब इसीका द्वक्तव्यमितीदमिदानीमारभ्यते— विचार आरम्भ किया जाता है— तत्र पितापुत्राख्यायिकायां तहाँ पूर्वोक्त विद्याकी शेषभूत पितापुत्रसम्बन्धिनी आख्यायिकामें पूर्वविद्याशेषभूतायां तपो ब्रह्म- तप ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिका साधन विद्यासाधनमुक्तम्। प्राणादेरा- बतलाया गया है; तथा आकाशपर्यन्त प्राणादि कार्यवर्गका अन्न और काशान्तस्य च कार्यस्यान्नान्ना- अन्नादरूपसे विनियोग एवं ब्रह्म- सम्बन्धिनी उपासनाओंका प्रतिपादन दत्वेन विनियोगश्चोक्तः, ब्रह्म- किया गया है। इसी प्रकार विषयोपासनानि च। ये च सर्वे आकाशादि कार्यभेदसे सम्बन्धित CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri