भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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अनु० ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २२५

इत्यन्नवान् । सत्तामात्रेण तु | बहुत-सा अन्न हो उसे अन्नवान् | कहते हैं।* अन्नकी सत्तामात्रसे तो सर्वो ह्यन्नवानिति विद्याया | सभी अन्नवान् हैं, अतः [यदि उस | प्रकार अर्थ किया जाय तो] विशेषो न स्यात् । एवमन्नमत्ती- | विद्याकी कोई विशेषता नहीं रहती। | इसी प्रकार वह अन्नाद-जो अन्नभक्षण त्यन्नादो दीप्ताग्निर्भवतीत्यर्थः । | करे यानी दीप्ताग्नि हो जाता है। वह महान्भवति । केन महत्त्वमित्यत | महान् हो जाता है। उसका महत्त्व | किस कारणसे होता है ? इसपर आह--प्रजया पुत्रादिना पशु- | कहते हैं-पुत्रादि प्रजा, गौ, अश्व | आदि पशु तथा ब्रह्मतेज यानी शम, भिर्गवाश्वादिभिर्ब्रह्मवर्चसेन शम- | दम एवं ज्ञानादिके कारण होनेवाले दमज्ञानादिनिमित्तेन तेजसा । | तेजसे तथा कीर्ति यानी शुभाचरणके | कारण होनेवाली ख्यातिसे वह महान्भवति कीर्त्या ख्यात्या | महान् हो जाता है ॥ १ ॥ शुभप्रचारनिमित्तया ॥१॥ इति भृगुवल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥६॥

  • मूलमें केवल 'अन्नवान्' है, भाष्यमें उसका अर्थ 'प्रभूत (बहुतसे) अन्नवाला' किया गया है। इससे यह शंका होती है कि 'प्रभूत' विशेषणका प्रयोग क्यों किया गया। इसीका समाधान करनेके लिये आगेका वाक्य है। तै० उ० २९-३०- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri