भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 232

सप्तम अनुवाक अन्नकी निन्दा न करनारूप व्रत तथा शरीर और प्राणरूप अन्न- ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥१॥ अन्नकी निन्दा न करे। यह ब्रह्मज्ञका व्रत है। प्राण ही अन्न है और शरीर अन्नाद है। प्राणमें शरीर स्थित है और शरीरमें प्राण स्थित है। इस प्रकार [ एक दूसरेके आश्रित होनेसे वे एक दूसरेके अन्न हैं; अतः ] ये दोनों अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित ( प्रख्यात ) होता है, अन्नवान् और अन्नभोक्ता होता है। प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥

किं चान्नेन द्वारभूतेन ब्रह्मइसके सिवा क्योंकि द्वारभूत
विज्ञातं यस्मात्तस्माद्गुरुमिवअन्नके द्वारा ही ब्रह्मको जाना है इसलिये गुरुके समान अन्नकी भी
अन्नं न निन्द्यात्तदस्यैवं ब्रह्म-निन्दा न करे। इस प्रकार ब्रह्म-वेत्ताके लिये यह व्रत उपदेश किया
विदो व्रतमुपदिश्यते । व्रतोप-जाता है। यह व्रतका उपदेश

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri