तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें२३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३ भावसे उसकी उपासना करे। इससे सम्पूर्ण काम्य पदार्थ उसके प्रति विनम्र हो जाते हैं। वह ब्रह्म है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। इससे वह ब्रह्मनिष्ठ होता है। वह ब्रह्मका परिमर (आकाश) है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। इससे उससे द्वेष करनेवाले उसके प्रति- पक्षी मर जाते हैं, तथा जो अप्रिय भ्रातृव्य (भाईके पुत्र) होते हैं वे भी मर जाते हैं। वह, जो कि इस पुरुषमें है और वह जो इस आदित्यमें है, एक है ॥ ४ ॥
तथा पृथिव्याकाशोपासकस्य | तथा पृथिवी और आकाशकी आतिथ्योपदेशः वसतौ वसतिनि- | [ अन्न एवं अन्नादरूपसे ] उपासना मित्तं कंचन कंचि- | करनेवालेके यहाँ रहनेके लिये कोई दपि न प्रत्याचक्षीत वसत्यर्थ- | भी आवे उसे उसका परित्याग नहीं मागतं न निवारयेदित्यर्थः । | करना चाहिये। अर्थात् अपने यहाँ वासे च दत्तेऽवश्यं ह्यशनं दात- | निवास करनेके लिये आये हुए व्यम् । तस्माद्यया कया च | किसी भी व्यक्तिका वह निवारण विधया येन केन च प्रकारेण | न करे। जब किसीको रहनेका बह्वन्नं प्राप्नुयाद्बह्वन्नसंग्रहं | स्थान दिया जाय तो उसे भोजन भी कुर्यादित्यर्थः । | अवश्य देना चाहिये । अतः जिस- | किसी भी विधिसे यानी किसी-न- | किसी प्रकार बहुत-सा अन्न प्राप्त | करे; अर्थात् खूब अन्न-संग्रह करे।
यस्मादन्नवन्तो विद्वांसोऽभ्या- | क्योंकि अन्नवान् उपासकगण गतायान्नार्थिनेऽराधि संसिद्ध- | अपने यहाँ आये हुए अन्नार्थीसे मष्मा अन्नमित्याचक्षते न | 'अन्न तैयार है' ऐसा कहते हैं- नास्तीति प्रत्याख्यानं कुर्वन्ति । | 'अन्न नहीं है' ऐसा कहकर उसका तस्माच्च हेतोर्बह्वन्नं प्राप्नुयादिति | परित्याग नहीं करते। इसलिये भी पूर्वेण संबन्धः । अपि चान्ना- | बहुत-सा अन्न उपार्जन करे—इस | प्रकार इसका पूर्ववाक्यसे सम्बन्ध
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri