भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 239

अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३३ [संस्कृत-मूल/भाष्य] नस्य माहात्म्यमुच्यते । यथा । यत्कालं प्रयच्छत्यन्नं तथा तत्कालमेव प्रत्युपनमते । कथ- मिति तदेतदाह— एतद्वा अन्नं मुखतो मुख्ये [हाशिया: वृत्तिभेदेनान्न-दानस्य फलभेदः] प्रथमे वयसि मु- ख्यया वा वृत्त्या पूजापुरःसरमभ्यागतायान्नार्थिने राद्धं संसिद्धं प्रयच्छतीति वाक्य- शेषः । तस्य किं फलं स्यादि- त्युच्यते—मुखतः पूर्वे वयसि मुख्यया वा वृत्त्यास्मा अन्नादा- यान्नं राध्यते यथादत्तमुपतिष्ठत इत्यर्थः । एवं मध्यतो मध्यमे वयसि मध्यमेन चोपचारेण । तथाऽन्ततोऽन्ते वयसि जघन्येन चोपचारेण परिभवेन तथैवास्मै राध्यते संसिध्यत्यन्नम् ॥ १ ॥ य एवं वेद य एवमन्नस्य यथोक्तं माहात्म्यं वेद तद्दानस्य च फलम्, तस्य यथोक्तं फल- मुपनमते । [भाष्यार्थ / हिन्दी अनुवाद] है । अब अन्नदानका माहात्म्य कहा जाता है—जो पुरुष जिस प्रकार और जिस समय अन्न-दान करता है उसे उसी प्रकार और उसी समय उसकी प्राप्ति होती है । ऐसा किस प्रकार होता है ? सो बतलाते हैं— जो पुरुष मुखतः—मुख्य—प्रथम अवस्थामें अथवा मुख्य वृत्तिसे यानी सत्कारपूर्वक राद्ध अर्थात् सिद्ध (पक्व) अन्नको अपने यहाँ आये हुए अन्नार्थी अतिथिको देता है— यहाँ प्रयच्छति (देता है) यह क्रियापद वाक्यशेष (अनुक्त अंश) है—उसे क्या फल मिलता है, सो बतलाया जाता है—इस अन्नदाताको मुखतः—प्रथम अवस्थामें अथवा मुख्य वृत्तिसे अन्न प्राप्त होता है; अर्थात् जिस प्रकार दिया जाता है उसी प्रकार प्राप्त होता है । इसी प्रकार मध्यतः मध्यम आयुमें अथवा मध्यम वृत्तिसे तथा अन्ततः—अन्तिम आयुमें अथवा निकृष्ट वृत्तिसे यानी तिरस्कारपूर्वक देनेसे इसे उसी प्रकार अन्नकी प्राप्ति होती है ॥१॥ जो इस प्रकार जानता है—जो इस प्रकार अन्नका पूर्वोक्त माहात्म्य और उसके दानका फल जानता है उसे पूर्वोक्त फलकी प्राप्ति होती है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri