भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २४५ ब्रह्मवेत्ताद्वारा गाया जानेवाला साम कः पुनरसौ विस्मयः ? | किन्तु वह विस्मय क्या है ? सो इत्युच्यते— | बतलाया जाता है— अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अहमन्नादो ३ ऽहमन्नादो ३ ऽहमन्नादः । अह ँश्लोककृदह ँश्लोककृदह ँश्लोककृत् । अहमस्मि प्रथमजा ऋता ३स्य । पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना ३ भायि । यो मा ददाति स इदेव मा ३वाः । अहमन्नमन्नम- दन्तमा ३द्मि । अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा ३म् । सुवर्न ज्योतिः य एवं वेद । इत्युपनिषत् ॥ ६ ॥ मैं अन्न ( भोग्य ) हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ; मैं ही अन्नाद ( भोक्ता ) हूँ, मैं ही अन्नाद हूँ, मैं ही अन्नाद हूँ; मैं ही श्लोककृत् ( अन्न और अन्नादके संघातका कर्ता ) हूँ, मैं ही श्लोककृत् हूँ, मैं ही श्लोककृत् हूँ । मैं ही इस सत्यासत्यरूप जगत्के पहले उत्पन्न हुआ [ हिरण्यगर्भ ] हूँ । मैं ही देवताओंसे पूर्ववर्ती विराट् एवं अमृतत्वका केन्द्रस्वरूप हूँ । जो [ अन्नस्वरूप ] मुझे [ अन्नार्थियोंको ] देता है वह इस प्रकार मेरी रक्षा करता है, किन्तु [ जो मुझ अन्नस्वरूपको दान न करता हुआ स्वयं भोगता है उस ] अन्न भक्षण करनेवालेको मैं अन्नरूपसे भक्षण करता हूँ । मैं इस सम्पूर्ण भुवनका पराभव करता हूँ, हमारी ज्योति सूर्यके समान नित्यप्रकाशस्वरूप है । ऐसी यह उपनिषद् [ ब्रह्म- विद्या ] है । जो इसे इस प्रकार जानता है [ उसे पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है ] ॥ ६ ॥ अद्वैत आत्मा निरञ्जनोऽपि | निर्मल अद्वैत आत्मा होनेपर भी सन्नहमेवान्नमन्नादश्च । किं चाह- | मैं ही अन्न और अन्नाद हूँ तथा मैं मेव श्लोककृत् । श्लोको नामा- | ही श्लोककृत् हूँ । 'श्लोक' अन्न और न्नान्नादयोः संघातस्तस्य कर्ता | अन्नादके संघातको कहते हैं उसका CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri