तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें२४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३ चेतनावान् । अन्नस्यैव वा परा- | चेतनावान् कर्ता हूँ । अथवा परार्थ र्थस्यान्नादार्थस्य सतोऽनेकात्म- | यानी अन्नादके लिये होनेवाले अन्नका कस्य परार्थ्येन हेतुना संघात- | जो परार्थ्यरूप हेतुके कारण ही अनेकात्मक है, मैं संघात करनेवाला कृत् । त्रिरुक्तिर्विस्मयत्वख्याप- | हूँ । मूलमें जो तीन बार कहा गया है नार्था । | वह विस्मयत्व प्रकट करनेके लिये है । अहमस्मि भवामि । प्रथमजाः | मैं इस ऋत—सत्य यानी मूर्त्ता- प्रथमजः प्रथमोत्पन्न ऋतस्य | मूर्त्तरूप जगत्का 'प्रथमजा'—प्रथम सत्यस्य मूर्त्तामूर्त्तस्यास्य जगतः । | उत्पन्न होनेवाला (हिरण्यगर्भ) हूँ। देवेभ्यश्च पूर्वम् । अमृतस्य नाभि- | मैं देवताओंसे पहले होनेवाला और रमृतत्वस्य नाभिम्र्मध्यं मत्संस्र्थ- | अमृतका नाभि यानी अमरत्वका मममृतत्वं प्राणिनामित्यर्थः । | मध्य (केन्द्रस्थान) हूँ; अर्थात् प्राणियोंका अमृतत्व मेरेमें स्थित है । यः कश्चिन्मा मामन्नमन्नार्थि- | जो कोई अन्नरूप मुझे अन्नार्थियों- भ्यो ददाति प्रयच्छत्यन्नात्मना | को दान करता है अर्थात् अन्नात्म- ब्रवीति स इदित्यमेवमविनष्टं | भावसे मेरा वर्णन करता है वह इस प्रकार अविनष्ट और यथार्थ यथाभूतमावा अवतीत्यर्थः । यः | अन्नस्वरूप मेरी रक्षा करता है। पुनरन्यो मामदत्त्वार्थिभ्यः काले | किन्तु जो समय उपस्थित होनेपर प्राप्तेऽन्नमत्ति तमन्नमदन्तं भक्ष- | अन्नार्थियोंको मेरा दान न कर स्वयं ही अन्न भक्षण करता है उस यन्तं पुरुषमहमन्नमेव संप्रत्यद्मि | अन्न भक्षण करनेवाले पुरुषको मैं भक्षयामि । | अन्न ही खा जाता हूँ। अत्राहैवं तर्हि बिभेमि सर्वा- | इसपर कोई वादी कहता है— यदि ऐसी बात है तब तो मैं सर्वात्मत्वप्राप्तिरूप मोक्षसे डरता हूँ; त्मत्वप्राप्तेर्मोक्षादस्तु संसार एव | इससे तो मुझे संसारहीकी प्राप्ति CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri