भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 49

अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३ स्मार्यन्ते वा इत्यनेन । तिस्र एताः | अव्ययसे परामृष्ट व्याहृतियोंका | स्मरण कराया जाता है। अर्थात् प्रसिद्धा व्याहृतयः स्मार्यन्ते | [इन शब्दोंसे] ये तीन प्रसिद्ध | व्याहृतियाँ स्मरण दिलायी जाती तावत् । तासामियं चतुर्थी | हैं। उनमें 'महः' यह चौथी व्याहृतिर्मह इति । तामेतां चतुर्थी | व्याहृति है । उस इस चौथी | व्याहृतिको महाचमसका पुत्र माहा- महाचमसस्यापत्यं माहाचमस्यः | चमस्य जानता है । किन्तु 'उ ह | स्म' ये तीन निपात अतीत घटना- प्रवेदयते । उ ह स्म इत्येतेषां वृत्ता- | का अनुकथन करनेके लिये होनेके | कारण इसका अर्थ 'जानता था' नुकथनार्थत्वाद्विदितवान्ददर्श- | 'देखा था' इस प्रकार होगा । त्यर्थः । माहाचमस्यग्रहणमार्षा- | [व्याहृतिके द्रष्टा] ऋषिका अनु- | स्मरण करनेके लिये 'माहाचमस्य' नुस्मरणार्थम् । ऋषिसंस्मरणमप्यु- | यह नाम लिया गया है । इस प्रकार | यहाँ उपदेश होनेके कारण यह पासनाङ्कमिति गम्यत इहो- | जाना जाता है कि ऋषिका अनु- पदेशात् । | स्मरण भी उपासनाका एक अङ्ग है। येयं माहाचमस्येन दृष्टा व्या- | जिस 'महः' नामक व्याहृतिको | माहाचमस्यने देखा था वह ब्रह्म है । [व्याहृतिषु महसः] हृतिर्मह इति तद्ब्रह्म । | ब्रह्म भी महान् है और व्याहृति भी [प्राधान्यम्] महद्धि ब्रह्म महश्च | महः है। और वह क्या है? वही | आत्मा है । 'व्याप्ति' अर्थवाले व्याहृतिः। किं पुनस्तत् ? स आत्मा। | 'आप्' धातुसे 'आत्मा' शब्द आप्नोतेर्व्याप्तिकर्मणः आत्मा । | निष्पन्न होता है । क्योंकि लोक, CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri