भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


इतराश्च व्याहृतयो लोका देवा | देव, वेद और प्राणरूप अन्य वेदाः प्राणाश्च मह इत्यनेन | व्याहृतियाँ आदित्य, चन्द्र, ब्रह्म एवं व्याहृत्यात्मनादित्यचन्द्रब्रह्मान्न- | अन्नस्वरूप व्याहृत्यात्मक महःसे भूतेन व्याप्यन्ते यतः अतो- | व्याप्त हैं, इसलिये वे अन्य देवता ऽङ्गान्यवयवा अन्या देवताः। | इसके अंग—अवयव हैं । यहाँ देवताग्रहणमुपलक्षणार्थं लोका- | लोकादिका उपलक्षण करानेके लिये दीनाम् । मह इत्येतस्य व्या- | 'देवता' शब्दका ग्रहण किया हृत्यात्मनो देवलोकादयः सर्वे- | गया है। क्योंकि देव और लोक ऽवयवभूता यतोऽत आहादित्या- | आदि सभी 'महः' इस व्याहृत्यात्माके दिभिर्लोकादयो महीयन्ते इति । | अवयवस्वरूप हैं, इसीलिये ऐसा आत्मनो ह्यङ्गानि महीयन्ते, महनं | कहा है कि आदित्यादिके योगसे वृद्धिरुपचयः । महीयन्ते वर्धन्त | लोकादि महत्ताको प्राप्त होते हैं । इत्यर्थः । | आत्मासे ही अङ्ग महत्ताको प्राप्त | हुआ करते हैं । 'महन' शब्दका | अर्थ वृद्धि—उपचय है । अतः | 'महीयन्ते' इसका 'वृद्धिको प्राप्त | होते हैं' यह अर्थ है । अयं लोकोऽग्निर्ऋग्वेदः प्राण | यह लोक, अग्नि, ऋग्वेद और प्रतिव्याहृति चत्वारो भेदाः इति प्रथमा व्याहृति- | प्राण—ये पहली व्याहृति भूः हैं; इसी भूरिति । एवमुत्त- | प्रकार उत्तरोत्तर प्रत्येक व्याहृति चार- रोत्तरैकैका चतुर्धा भवति । | चार प्रकारकी है ।* 'महः' ब्रह्म मह इति ब्रह्म । ब्रह्मेत्योङ्कारः, | है; ब्रह्मका अर्थ ओंकार है; क्योंकि शब्दाधिकारेऽन्यस्यासंभवात् । | शब्दके प्रकरणमें अन्य किसी ब्रह्म- उक्तार्थमन्यत् । | का होना असम्भव है । शेष सबका | अर्थ पहले कहा जा चुका है ।


* यथा अन्तरिक्षलोक, वायु, सामवेद और अपान—ये दूसरी व्याहृति भुवः हैं; द्युलोक, आदित्य, यजुर्वेद और व्यान—ये तीसरी व्याहृति सुवः हैं; तथा आदित्य, चन्द्रमा, ब्रह्म और अन्न—ये चौथी व्याहृति महः हैं ।


CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri