भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५ ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धेति । | वे ये चारों व्याहृतियाँ चार प्रकारकी हैं । अर्थात् वे ये भूः, भुवः, सुवः और महः चार व्याहृतियाँ प्रत्येक चार-चार प्रकारकी हैं । 'धा' शब्द 'प्रकार' का वाचक है । अर्थात् वे चार-चार होती हुई चार प्रकारकी हैं । उनकी जिस प्रकार पहले कल्पना की गयी है उसी प्रकार उपासना करनेका नियम करनेके लिये उनका पुनः उपदेश किया गया है । उन उपर्युक्त व्याहृतियोंको जो पुरुष जानता है वही जानता है । किसे जानता है ? ब्रह्मको । ता वा एता भूर्भुवः सुवर्मह इति चतस्र एकैकशश्चतुर्धा चतुष्प्र- काराः । धाशब्दः प्रकारवचनः । चतस्रश्चतस्रः सत्यश्चतुर्धा भव- न्तीत्यर्थः । तासां यथाक्लृप्तानां पुनरुपदेशस्तथैवोपासननियमार्थः। ता यथोक्तव्याहृतीर्यो वेद स वेद विजानाति । किम् ? ब्रह्म । ननु “तद्ब्रह्म स आत्मा” इति | शङ्का- "वह ब्रह्म है, वह आत्मा है" इस वाक्यद्वारा [ महः रूपसे ] ब्रह्मको जान लेनेपर भी उसे न जाननेके समान '[ उसे जो जानता है ] वह ब्रह्मको जानता है' ऐसा कहना तो ठीक नहीं है । ज्ञाते ब्रह्मणि न वक्तव्यमविज्ञात- वत्स वेद ब्रह्मेति । न; तद्विशेषविवक्षुत्वाद- | समाधान-ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उस [ ब्रह्मविषयक ज्ञान ] के विषयमें विशेष कहना अभीष्ट होनेके कारण इस प्रकार कहनेमें कोई दोष नहीं है । यह ठीक है कि इतना तो जान लिया कि चतुर्थ व्याहृतिरूप ब्रह्म है; किन्तु हृदयके भीतर उपलब्ध होना तथा मनो- मयत्वादिरूप उसकी विशेषताओंका दोषः । सत्यं विज्ञातं [पञ्चमषष्ठानु-वाक्ययोरेकवाक्यता] चतुर्थव्याहृत्यात्मा ब्रह्मेति न तु तद्विशेषो हृदयान्त- रुपलभ्यत्वं मनोमयत्वादिश्च ।