भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 52

४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ 'शान्तिसमृद्धम्' इत्येवमन्तो | तो ज्ञान नहीं हुआ । [अगले अनुवाक- विशेषणविशेष्यरूपो धर्मपूगो न | में ] 'शान्तिसमृद्धम्' इस वाक्यतक विज्ञायत इति तद्विवक्षु हि | कहा हुआ विशेषण-विशेष्यरूप धर्म- शास्त्रमविज्ञातमिव ब्रह्म मत्वा स | समूह ज्ञात नहीं है; उसे बतलानेकी वेद ब्रह्मेत्याह । अतो न दोषः । | इच्छासे ही शास्त्रने ब्रह्मको न जाने यो हि वक्ष्यमाणेन धर्मपूगेन | हुएके समान मानकर 'वह ब्रह्मको विशिष्टं ब्रह्म वेद स वेद ब्रह्मे- | जानता है' ऐसा कहा है । इसलिये त्यभिप्रायः । अतो वक्ष्यमाणा- | इसमें कोई दोष नहीं है । इसका नुवाके नैकवाक्यतास्य; उभयोर्ह्य- | अभिप्राय यह है कि जो पुरुष आगे नुवाकयोरेकमुपासनम् । | बतलाये जानेवाले धर्मसमूहसे | विशिष्ट ब्रह्मको जानता है वही लिङ्गाच्च, भूरित्यग्नौ प्रति- | ब्रह्मको जानता है । अतः आगे | कहे जानेवाले अनुवाकसे इसकी तिष्ठतीत्यादिकं लिङ्गमुपासने- | एकवाक्यता है; क्योंकि इन दोनों | अनुवाकोंकी एक ही उपासना है । कत्वे । विधायकाभावाच्च । न हि | [ ज्ञापक ] लिङ्ग होनेसे भी यही | बात सिद्ध होती है । [ छठे | अनुवाकमें ] 'भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति' 'वेद' 'उपासितव्यः' इति विधा- | इत्यादि फलश्रुति इन दोनों अनुवाकोंमें | एक ही उपासना होनेका लिङ्ग है । यकः कश्चिच्छब्दोऽस्ति। व्याहृत्य- | कोई विधान करनेवाला शब्द न | होनेके कारण भी ऐसा ही समझा | जाता है । [ छठे अनुवाकमें ] 'वेद' नुवाके 'ता यो वेद' इति च | 'उपासितव्यः' ऐसा कोई [ उपासना- | का ] विधान करनेवाला शब्द | नहीं है । व्याहृति-अनुवाकमें | जो 'उन ( व्याहृतियों ) को जो | जानता है' ऐसा वाक्य है वह

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