तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
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शिरःकपाले विनिर्गता या सेन्द्र- | पार-विभक्त यानी विदीर्ण करती हुई योनिरिन्द्रस्य ब्रह्मणो योनिर्मार्गः | बाहर निकल गयी है वही इन्द्रयोनि— स्वरूपप्रतिपत्तिद्वारमित्यर्थः । | इन्द्र अर्थात् ब्रह्मकी योनि—मार्ग यानी | ब्रह्मस्वरूपकी प्राप्तिका द्वार है । तयैवं विद्वान्मनोमयात्मदर्शी | इस प्रकार उस सुषुम्ना नाडीद्वारा [सुषुम्नाद्वारा] मूर्ध्ना विनिष्क्रम्या- | जाननेवाला अर्थात् मनोमय आत्मा- [चतुर्व्याहृतिरूप-] स्य लोकस्याधिष्ठा- | का साक्षात्कार करनेवाला पुरुष [ब्रह्मप्राप्तिः] ता भूरिति व्याहृति- | मूर्धद्वारसे निकलकर इस लोकका | अधिष्ठाता जो महान् ब्रह्मका अङ्ग- रूपो योऽग्निर्महतो ब्रह्मणोऽङ्गभूत- | भूत 'भूः' ऐसा व्याहृतिरूप अग्नि स्तस्मिन्नग्नौ प्रतितिष्ठत्यग्न्यात्मनेमं | है उस अग्निमें स्थित हो जाता है; | अर्थात् अग्निरूप होकर इस लोक- लोकं व्याप्नोतीत्यर्थः । तथा भुव | को व्याप्त कर लेता है । इसी प्रकार इति द्वितीयव्याहृत्यात्मनि वायौ । | वह 'भुवः' इस द्वितीय व्याहृति- | रूप वायुमें स्थित हो जाता है—इस प्रतितिष्ठतीत्यनुवर्तते । सुवरिति | प्रकार 'प्रतितिष्ठति' इस क्रियाकी | अनुवृत्ति की जाती है । तथा [ ऐसे तृतीयव्याहृत्यात्मन्यादित्ये । मह | ही ] 'सुवः' इस तृतीय व्याहृति- इत्यङ्गिनि चतुर्थव्याहृत्यात्मनि | रूप आदित्यमें और 'महः' इस | चतुर्थ व्याहृतिरूप अङ्गी ब्रह्ममें स्थित ब्रह्मणि प्रतितिष्ठति । | होता है । तेष्वात्मभावेन स्थित्वाप्नोति | उनमें आत्मस्वरूपसे स्थित हो वह [ब्रह्मभूतस्य] ब्रह्मभूतः स्वाराज्यं | ब्रह्मभूत हुआ स्वाराज्य—स्वराड्भावको [विदुष ऐश्वर्यम्] स्वराड्भावं स्वयमेव | प्राप्त कर लेता है अर्थात् जिस प्रकार | ब्रह्म अङ्गभूत देवताओंका अधिपति राजाधिपतिर्भवति । अङ्गभूतानां | है उसी प्रकार स्वयं उनका राजा— देवानां यथा ब्रह्म । देवाश्च | अधिपति हो जाता है । तथा उसके
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