तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें५२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ सर्वेऽस्मै बलिमावहन्त्यङ्गभूता | अङ्गभूत देवगण जिस प्रकार ब्रह्मको यथा ब्रह्मणे । आप्नोति | उसी प्रकार इस अपने अङ्गीके लिये मनसस्पतिम् । सर्वेषां हि | उपहार लाते हैं । तथा वह मनस्पति- मनसां पतिः सर्वात्मकत्वाद्व्र- | को प्राप्त हो जाता है । ब्रह्म सर्वात्मक ह्मणः । सर्वैर्हि मनोभिस्तन्मनुते । | होनेके कारण सम्पूर्ण मनोंका पति तदाप्नोत्येवं विद्वान् । किं च वा- | है, वह सारे ही मनोंद्वारा मनन क्पतिः सर्वासां वाचां पतिर्भवति । | करता है । इस प्रकार उपासनाद्वारा तथैव चक्षुष्पतिश्चक्षुषां पतिः । | विद्वान् उसे प्राप्त कर लेता है । यही श्रोत्रपतिः श्रोत्राणां पतिः । | नहीं, वह वाक्पति-सम्पूर्ण वाणियों- विज्ञानपतिर्विज्ञानानां च पतिः । | का पति हो जाता है, तथा चक्षु- सर्वात्मकत्वात्सर्वप्राणिनां करणै- | ष्पति-नेत्रोंका स्वामी, श्रोत्रपति- स्तद्वान्भवतीत्यर्थः । | कानोंका स्वामी और विज्ञानपति- किं च ततोऽप्यधिकतरमेतद्भवति । | विज्ञानोंका स्वामी हो जाता है । किं तत् ? उच्यते । आकाश- | तात्पर्य यह है कि सर्वात्मक होनेके शरीरमाकाशः शरीरमस्याकाश- | कारण वह समस्त प्राणियोंकी वद्वा सूक्ष्मं शरीरमस्येत्याकाश- | इन्द्रियोंसे इन्द्रियवान् होता है । शरीरम् । किं तत् ? प्रकृतं ब्रह्म । | यही नहीं, वह तो इससे भी बड़ा सत्यात्म सत्यं मूर्तामूर्तमवितथं | हो जाता है । सो क्या ? बतलाते स्वरूपं चात्मा स्वभावोऽस्य तदिदं | हैं—आकाशशरीर—आकाश जिसका सत्यात्म । प्राणारामं प्राणेष्वारा- | शरीर है अथवा आकाशके समान | जिसका सूक्ष्म शरीर है वही आकाश- | शरीर है । वह है कौन ? प्रकृत | ब्रह्म [ अर्थात् वह ब्रह्म जिसका यहाँ | प्रकरण है ] । सत्यात्म—जिसका | मूर्तामूर्तरूप सत्य अर्थात् अमिथ्या | 'सत्यात्म' कहते हैं । प्राणाराम—
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri