तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 59, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
[मूल संस्कृत / भाष्य] राम आक्रीडा यस्य तत्प्राणा- रामम् । प्राणानां वारामो यस्मिं- स्तत्प्राणारामम् । मनआनन्दम् ; आनन्दभूतं सुखकृदेव यस्य मनस्तन्मनआनन्दम् । शान्ति- समृद्धं शान्तिरूपशमः, शान्तिश्च तत्समृद्धं च शान्तिसमृद्धम् । शान्त्या वा समृद्धं तदुपलभ्यत इति शान्तिसमृद्धम् । अमृतम- मरणधर्मि । एतच्चाधिकरण- विशेषणं तत्रैव मनोमय इत्यादौ द्रष्टव्यमिति । एवं मनोमयत्वा- दिधर्मैर्विशिष्टं यथोक्तं ब्रह्म हे प्राचीनयोग्य, उपास्स्वेत्याचार्य- वचनोक्तिरादरार्था । उक्तस्तू- पासनाशब्दार्थः ॥ १-२ ॥
[हिन्दी अनुवाद] प्राणोंमें जिसका रमण अर्थात् क्रीडा है अथवा जिसमें प्राणोंका आरमण है उसे प्राणाराम कहते हैं । मन- आनन्दम्—जिसका मन आनन्दभूत अर्थात् सुखकारी ही है वह मन- आनन्द कहलाता है । शान्तिसमृद्धम् —शान्ति उपशमको कहते हैं, जो शान्ति भी है और समृद्ध भी वह शान्तिसमृद्ध है अथवा शान्तिके द्वारा उस समृद्ध ब्रह्मकी उपलब्धि होती है, इसलिये उसे शान्तिसमृद्ध कहते हैं । अमृत—अमरणधर्मी । ये अधिकरणमें आये हुए विशेषण उस मनोमय आदिमें ही जानने चाहिये । इस प्रकार मनोमयत्व आदि धर्मोंसे विशिष्ट उपर्युक्त ब्रह्मकी, हे प्राचीन- योग्य ! तू उपासना कर—यह आचार्यकी उक्ति [ उपासनाके ] आदरके लिये है । ‘उपासना’ शब्दका अर्थ तो पहले बतलाया ही जा चुका है ॥ १–२ ॥
इति शीक्षावल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥ ६ ॥