तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम अनुवाक
पाङ्क्तरूपसे ब्रह्मकी उपासना
यदेतद्व्याहृत्यात्मकं ब्रह्मो- | यह जो व्याहृतिरूप उपास्य पास्यमुक्तं तस्यैवेदानीं पृथिव्या- | ब्रह्म बतलाया गया है अब पृथिवी दिपाङ्क्तरूपेणोपासनमुच्यते । | आदि पाङ्क्तरूपसे उसीकी उपासना- पञ्चसंख्यायोगात्पङ्क्तिच्छन्दः- | का वर्णन किया जाता है—[पृथिवी संपत्तिः । ततः पाङ्क्तत्वं | आदि पाँच-पाँच संख्यावाले पदार्थ हैं सर्वस्य । पाङ्क्तश्च यज्ञः । | तथा पङ्क्तिछन्द भी पाँच पदोंवाला “पञ्चपदा पङ्क्तिः पाङ्क्तो | है, अतः] 'पाँच' संख्याका योग होनेसे यज्ञः” इति श्रुतेः । तेन यत्सर्वं | [उन पृथिवी आदिसे] पङ्क्तिछन्द लोकाद्यात्मान्तं च पाङ्क्तं परि- | सम्पन्न होता है । इसीसे उन सबका कल्पयति यज्ञमेव तत्परिकल्प- | पाङ्क्तत्व है । यज्ञ भी पाङ्क्त है, जैसा यति । तेन यज्ञेन परिकल्पितेन | कि “पङ्क्तिछन्द पाँच पदोंवाला है, पाङ्क्तात्मकं प्रजापतिमभि- | यज्ञ पाङ्क्त है” इस श्रुतिसे ज्ञात संपद्यते । तत्कथं पाङ्क्तमिदं | होता है । अतः जो लोकसे लेकर सर्वमित्यत आह— | आत्मापर्यन्त सबको पाङ्क्तरूपसे | कल्पना करता है वह यज्ञकी ही | कल्पना करता है । उस कल्पना | किये हुए यज्ञसे वह पाङ्क्तस्वरूप | प्रजापतिको प्राप्त हो जाता है । | अच्छा तो यह सब किस प्रकार | पाङ्क्त है ? सो अब बतलाते हैं—
पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशः । अग्निर्वायुरा- दित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि । आप ओषधयो वनस्पतय-
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri