तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५ आकाश आत्मा । इत्यधिभूतम् । अथाध्यात्मम् । प्राणो व्यानोऽपान उदानः समानः । चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् । चर्म माग्ँस्नावास्थि मज्जा । एतदधिविधाय ऋषिरवोचत् । पाङ्क्तं वा इदग्ँसर्वम् । पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तग्ँस्पृणोतीति ॥ १ ॥ पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, दिशाएँ और अवान्तर दिशाएँ [—यह लोकपाङ्क्त ]; अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा और नक्षत्र [—यह देवता- पाङ्क्त ] तथा आप, ओषधि, वनस्पति, आकाश और आत्मा—ये अधिभूतपाङ्क्त हैं। अब अध्यात्मपाङ्क्त बतलाते हैं—प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान [ —यह वायुपाङ्क्त ]; चक्षु, श्रोत्र, मन, वाक् और त्वचा [—यह इन्द्रियपाङ्क्त ] तथा चर्म, मांस, स्नायु, अस्थि और मज्जा [—यह धातुपाङ्क्त—ये सब मिलाकर अध्यात्मपाङ्क्त हैं ] । इस प्रकार पाङ्क्तोपासनाका विधानकर ऋषिने कहा—'यह सब पाङ्क्त ही है; इस [ आध्यात्मिक ] पाङ्क्तसे ही उपासक [ बाह्य ] पाङ्क्तको पूर्ण करता है' ॥ १ ॥ पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवा- | पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, त्रिविध- न्तरदिश इति लो- | दिशाएँ और अवान्तर दिशाएँ—ये भूतपाङ्क्तम् कपाङ्क्तम् । अग्नि- | लोकपाङ्क्त हैं; अग्नि, वायु, आदित्य, वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणीति | चन्द्रमा और नक्षत्र—ये देवतापाङ्क्त देवतापाङ्क्तम् । आप ओषधयो | हैं; जल, ओषधि, वनस्पति, आकाश वनस्पतय आकाश आत्मेति | और आत्मा—ये भूतपाङ्क्त हैं । यहाँ भूतपाङ्क्तम् । आत्मेति विराड् | 'आत्मा' विराट्को कहा है; क्योंकि भूताधिकारात् । इत्यधिभूतमि- | यह भूतोंका अधिकरण है 'इत्यधि- | भूतम्' यह वाक्य अधिलोक और