भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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५६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

त्यधिलोकाधिदैवतपाङ्क्तद्वयोप- | अधिदैवत-इन दो पाङ्क्तोंका भी लक्षणार्थम् । लोकदेवतापाङ्क्त- | उपलक्षण करानेके लिये है; क्योंकि योश्चाभिहितत्वात् । | इनमें लोक और देवतासम्बन्धी दो | पाङ्क्तोंका भी वर्णन किया गया है । अथानन्तरमध्यात्मं पाङ्क्त- | अब आगे तीन अध्यात्मपाङ्क्तों- (त्रिविधाध्यात्म-पाङ्क्तम्) त्रयमुच्यते-प्राणा- | का वर्णन किया जाता है-प्राणादि दि वायुपाङ्क्तम् । | वायुपाङ्क्त, चक्षु आदि इन्द्रियपाङ्क्त चक्षुरादीन्द्रियपाङ्क्तम् । चर्मादि | और चर्मादि धातुपाङ्क्त-बस ये धातुपाङ्क्तम् । एतावद्धीदं | इतने ही अध्यात्म और बाह्य पाङ्क्त सर्वमध्यात्मम्, बाह्यं च | हैं । इनका इस प्रकार त्रिधान अर्थात् पाङ्क्तमेवेत्येतदेवमधिविधाय | कल्पना करके ऋषि-वेद अथवा परिकल्प्यर्षिर्वेद एतद्दर्शनसंपन्नो | इस दृष्टिसे सम्पन्न किसी ऋषिने वा कश्चिदृषिरवोचदुक्तवान् । | कहा । क्या कहा ? सो बतलाते किमित्याह-पाङ्क्तं वा इदं सर्वं | हैं-निश्चय ही यह सब पाङ्क्त ही पाङ्क्तेनैवाध्यात्मिकेन संख्या- | है । आध्यात्मिक पाङ्क्तसे ही, सामान्यात्पाङ्क्तं बाह्यं स्पृणोति | संख्यामें समानता होनेके कारण बलयति पूरयति । एकात्मतयो- | उपासक बाह्यपाङ्क्तको बलवान्- पलभ्यत इत्येतत् । एवं पाङ्क्त- | पूरित करता है अर्थात् उसके साथ मिदं सर्वमिति यो वेद स प्रजा- | एकरूपसे उपलब्ध करता है । इस पत्यात्मैव भवतीत्यर्थः ॥ १ ॥ | प्रकार 'यह सब पाङ्क्त है' ऐसा | जो पुरुष जानता है वह प्रजापति- | स्वरूप ही हो जाता है-ऐसा इसका | तात्पर्य है ॥ १ ॥ इति शीक्षावल्ल्यां सप्तमोऽनुवाकः

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri