तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ 'ॐ' यह शब्द ब्रह्म है, क्योंकि 'ॐ' यह सर्वरूप है; 'ॐ' यह अनुकृति ( अनुकरण—सम्मतिसूचक संकेत ) है—ऐसा प्रसिद्ध है । [ याज्ञिकलोग ] “ओ श्रावय” ऐसा कहकर श्रवण कराते हैं । ‘ॐ’ ऐसा कहकर सामगान करते हैं।' ‘ॐ शोम् ऐसा कहकर शस्त्रों (गीति- रहित ऋचाओं) का पाठ करते हैं। अध्वर्यु प्रतिगर (प्रत्येक कर्म) के प्रति ‘ॐ’ ऐसा उच्चारण करता है। 'ॐ' ऐसा कहकर ब्रह्मा अनुज्ञा देता है; 'ॐ' ऐसा कहकर वह अग्निहोत्रके लिये आज्ञा देता है । वेदाध्ययन करनेवाला ब्राह्मण 'ॐ' ऐसा उच्चारण करता हुआ कहता है—'मैं ब्रह्म (वेद अथवा परब्रह्म) को प्राप्त करूँ।' इससे वह ब्रह्मको ही प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥
ॐमिति । इतिशब्दः स्वरूप- | ‘ओमिति' इसमें 'इति' शब्द ओङ्कारस्य परिच्छेदार्थः, ओ- | ओंकारके स्वरूपका परिच्छेद सर्वात्म्यम् मित्येतच्छब्दरूपं | (निर्देश) करनेके लिये है। अर्थात् ब्रह्मति मनसा धारयेदुपासीत । | 'ॐ' यह शब्दरूप ब्रह्म है—ऐसा यत ओमितीदं सर्वं हि शब्दरूप- | इसका मनसे ध्यान—उपासना करे; मोङ्कारेण व्याप्तम् । "तद्यथा | क्योंकि 'ॐ' यही सब कुछ है, कारण, समस्त शब्दरूप प्रपञ्च शङ्कुना" (छा० उ० २ । २३ । | ओंकारसे व्याप्त है, जैसा कि 'जिस प्रकार शंकुसे पत्ते व्याप्त रहते हैं' ३) इति श्रुत्यन्तरात् । अभि- | इत्यादि एक दूसरी श्रुतिसे सिद्ध धानतन्त्रं ह्यभिधेयमित्यत इदं | होता है । सम्पूर्ण वाच्य वाचकके सर्वमोङ्कार इत्युच्यते । | ही अधीन होता है, इसलिये यह सब ओंकार ही कहा जाता है । ओङ्कारस्तुत्यर्थमुत्तरो ग्रन्थः । | आगेका ग्रन्थ ओंकारकी स्तुतिके उपास्यत्वात्तस्य । | लिये है; क्योंकि वह उपासनीय ओङ्कारमहिमा ओमित्येतदनुकृति- | है । ‘ॐ' यह अनुकृति यानी रनुकऱणम् । करोमि यास्यामि | अनुकरण है । इसीसे किसीके द्वारा 'मैं करता हूँ, मैं जाता