तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ
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६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
ओमित्येव ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन् | प्रवचन अर्थात् अध्ययन करनेवाला प्रवचनं करिष्यन्नध्येष्यमाण | ब्राह्मण ‘ॐ’ ऐसा उच्चारण करता ओमित्येवाह । ओमित्येव प्रति- | है; अर्थात् ‘ॐ’ ऐसा कहकर ही पद्यतेऽध्येतुमित्यर्थः । ब्रह्मवेद- | वह अध्ययन करनेके लिये प्रवृत्त होता मुपाप्नवानीति प्राप्नुयां ग्रही- | है । ‘मैं ब्रह्म यानी वेदको प्राप्त करूँ ष्यामीत्युपाप्नोत्येव ब्रह्म । | अर्थात् उसे ग्रहण करूँ’ ऐसा कहकर अथवा ब्रह्म परमात्मा तमु- | वह ब्रह्मको प्राप्त कर ही लेता है । पाप्नवानीत्यात्मानं प्रवक्ष्यन्प्राप- | अथवा [ यों समझो कि ] ‘मैं ब्रह्म- यिष्यन्नोमित्येवाह । स च तेनो- | परमात्माको प्राप्त करूँ’ इस प्रकार ङ्कारेण ब्रह्म प्राप्नोत्येव । ओङ्का- | आत्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे वह रपूर्वं प्रवृत्तानां क्रियाणां फलवत्त्वं | ‘ॐ’ ऐसा ही कहता है और यस्मात्तस्मादोङ्कारं ब्रह्मेत्युपासी- | उस ॐकारके द्वारा वह ब्रह्मको तेति वाक्यार्थः ॥ १ ॥ | प्राप्त कर ही लेता है । इस प्रकार | क्योंकि ॐकारपूर्वक प्रवृत्त होनेवाली | क्रियाएँ फलवती होती हैं इसलिये | ‘ॐकार ब्रह्म है’ इस तरह उसकी | उपासना करे—यह इस वाक्यका | अर्थ है ॥ १ ॥
इति शीक्षावल्ल्यामष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥