भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

७८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ ꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤ मोक्ष-साधनकी मीमांसा

अत्रैतच्चिन्त्यते विद्याकर्मणो- | अब विद्या और कर्मका विवेक र्विवेक़ार्थं किं कर्म- [मोक्षकारण-मीमांसायां चत्वारो विकल्पाः] | [ अर्थात् इन दोनोंका फल भिन्न- भ्य एव केवलेभ्यः | भिन्न है—इसका निश्चय ] करनेके परं श्रेय उत वि- | लिये यह विचार किया जाता है द्यासव्यपेक्षेभ्य आहोस्विद्विद्या- | कि ( १ ) क्या परम श्रेयकी प्राप्ति कर्मभ्यां संहताभ्यां विद्याया वा | केवल कर्मसे होती है, ( २ ) अथवा कर्मापेक्षाया उत केवलाया एव | विद्याकी अपेक्षायुक्त कर्मसे, ( ३ ) विद्याया इति ? | किंवा परस्पर मिले हुए विद्या और | कर्म दोनोंसे, ( ४ ) अथवा कर्मकी | अपेक्षा रखनेवाली विद्यासे, ( ५ ) | या केवल विद्यासे ही ?

तत्र केवलेभ्य एव कर्मभ्यः | उनमें [ पहला पक्ष यह है कि ] स्यात् । समस्तवे- [कर्मणां मोक्ष-साधनत्वनिरासः] | केवल कर्मोंसे ही परम श्रेयकी प्राप्ति दार्थज्ञानवतः कर्मा- | हो सकती है; क्योंकि “द्विजातिको धिकारात् । “वेदः कृत्स्नोऽधि- | रहस्यके सहित सम्पूर्ण वेदका ज्ञान गन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना” | प्राप्त करना चाहिये” ऐसी स्मृति इति स्मरणात् । अधिगमश्च | होनेसे सम्पूर्ण वेदका ज्ञान रखने- सहोपनिषदर्थेनात्मज्ञानादिना । | वालेको ही कर्मका अधिकार है और “विद्वान्यजते” “विद्वान्याज- | वेदका ज्ञान उपनिषद्के अर्थभूत यति” इति च विदुष एव कर्म- | आत्मज्ञानादिके सहित ही हो ण्यधिकारः प्रदर्श्यते सर्वत्र | सकता है । “विद्वान् यज्ञ करता “ज्ञात्वा चानुष्ठानम्” इति च । | है” “विद्वान् यज्ञ कराता है” | इत्यादि वाक्योंसे सर्वत्र विद्वान्का ही | कर्ममें अधिकार दिखलाया गया | है; तथा “जानकर कर्मानुष्ठान | करे” ऐसा भी कहा है । कोई-कोई

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri