तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें[अनु० ११] \qquad शाङ्करभाष्यार्थ \qquad ७९
[संस्कृत-मूल]
कृत्स्नश्च वेदः कर्मार्थ इति हि मन्यन्ते केचित् । कर्मभ्यश्चेत्परं श्रेयो नावाप्यते वेदोऽनर्थकः स्यात् ।
न; नित्यत्वान्मोक्षस्य, नित्यो हि मोक्ष इष्यते । कर्मकार्य- स्यानित्यत्वं प्रसिद्धं लोके । कर्मभ्यश्चेच्छ्रेयो नित्यं स्यात्तच्चा- निष्टम् । "तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते" (छा० उ० ८ । १ । ६) इति न्यायानुगृहीत- श्रुतिविरोधात् ।
काम्यप्रतिषिद्धयोरनारम्भा- दारब्धस्य च कर्मण उपभोगेन क्षयान्नित्यानुष्ठानाच्च तत्प्रत्यवा- यानुत्पत्तेर्ज्ञाननिरपेक्ष एव मोक्ष इति चेत् ?
तच्च न; शेषकर्मसंभवात्तन्नि- मित्तशरीरान्तरोत्पत्तिः प्राप्नो-
[हिन्दी-अनुवाद]
ऐसा भी मानते हैं कि सम्पूर्ण वेद कर्मके ही लिये हैं; और यदि कर्मोंसे ही परम श्रेयकी प्राप्ति न हुई तो वेद भी व्यर्थ ही हो जायगा ।
सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि मोक्षका नित्यत्व है—मोक्ष नित्य ही माना गया है । और जो वस्तु कर्मका कार्य है उसकी अनित्यता लोकमें प्रसिद्ध है । यदि नित्य श्रेय कर्मोंसे होता है ऐसा मानें तो इष्ट नहीं है; क्योंकि इसका "जिस प्रकार यह कर्मोपार्जित लोक क्षीण होता है [उसी प्रकार पुण्यार्जित परलोक भी क्षीण हो जाता है]" इस न्याययुक्ता श्रुतिसे विरोध है ।
पूर्व०—काम्य और प्रतिषिद्ध कर्मोंका आरम्भ न करनेसे, प्रारब्ध कर्मोंका भोगसे ही क्षय हो जानेसे तथा नित्य कर्मोंके अनुष्ठानके कारण प्रत्यवायकी उत्पत्ति न होनेसे मोक्ष ज्ञानकी अपेक्षासे रहित ही है—यदि ऐसा मानें तो ?
सिद्धान्ती—ऐसी बात भी नहीं है; शेष (सञ्चित) कर्मोंके रह जानेसे उनके कारण अन्य शरीरकी उत्पत्ति सिद्ध होती है—इस प्रकार