तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें[शीर्षक] ८० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[वाम स्तम्भ] तीति प्रत्युक्तम् । कर्मशेषस्य च नित्यानुष्ठानेनाविरोधात्क्षयानुप- पत्तिरिति च । यदुक्तं समस्तवेदार्थज्ञानवतः कर्माधिकारादित्यादि, तच्च न; श्रुतज्ञानव्यतिरेकादुपासनस्य । श्रुतज्ञानमात्रेण हि कर्मण्यधि- क्रियते नोपासनमपेक्षते । उपा- सनं च श्रुतज्ञानादर्थान्तरं वि- धीयते । मोक्षफलमर्थान्तरप्रसिद्धं च स्यात् । 'श्रोतव्यः' इत्युक्त्वा तद्व्यतिरेकेण 'मन्तव्यो निदि- ध्यासितव्यः' इति यत्नान्तरवि- धानात् । मनननिदिध्यासनयोश्च प्रसिद्धं श्रवणज्ञानादर्थान्तरत्त्वम् । एवं तर्हि विद्यासव्यपेक्षेभ्यः [पार्श्व टिप्पणी: ज्ञानकर्मसमुच्चयस्य मोक्षसाधनत्वनिरासः] कर्मभ्यः स्यान्मोक्षः। विद्यासहितानां च कर्मणां भवेत्कार्या-
[दक्षिण स्तम्भ] हम इसका पहले ही खण्डन कर चुके हैं; तथा नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे सञ्चित कर्मोंका विरोध न होनेके कारण उनका क्षय होना सम्भव नहीं है । और यह जो कहा कि समस्त वेदके अर्थको जाननेवालेको ही कर्मका अधिकार होनेके कारण [ केवल कर्मसे ही निःश्रेयसकी प्राप्ति हो सकती है ] सो भी ठीक नहीं; क्योंकि उपासना श्रुतज्ञान ( गुरु- कुलमें किये हुए वाक्यविचार ) से भिन्न ही है । मनुष्य श्रुतज्ञानमात्रसे ही कर्मका अधिकारी हो जाता है, इसके लिये वह उपासनाकी अपेक्षा नहीं रखता । उपासना तो श्रुतज्ञान- से भिन्न वस्तु ही बतलायी गयी है । वह उपासना मोक्षरूप फलवाली और अर्थान्तररूपसे प्रसिद्ध है; क्योंकि 'श्रोतव्यः' ऐसा कहकर [ मनन और निदिध्यासनके लिये ] 'मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः'--इस प्रकार पृथक् यत्नान्तरका विधान किया है । लोकमें भी श्रवणज्ञानसे मनन और निदिध्यासनका अर्थान्त- रत्व प्रसिद्ध ही है । पूर्व०-इस प्रकार तब तो विद्या- की अपेक्षासे युक्त कर्मोंद्वारा ही मोक्ष हो सकता है । जो कर्म ज्ञान के सहित होते हैं उनमें कार्यान्र्तर-