तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
न्तरारम्भसामर्थ्यम् । यथा स्वतो | आरम्भका सामर्थ्य हो सकता है, मरणज्वरादिकार्यारम्भसमर्थाना- | जिस प्रकार कि स्वयं मरण और मपि विषदध्यादीनां मन्त्रशर्क- | ज्वरादि कार्योंके आरम्भमें समर्थ रादिसंयुक्तानां कार्यान्तरारम्भ- | होनेपर भी विष एवं दधि आदिमें सामर्थ्यम्, एवं विद्यासहितैः | मन्त्र और शर्करादिसे युक्त होनेपर कर्मभिर्मोक्ष आरभ्यत इति चेत् ? | कार्यान्तरके आरम्भका सामर्थ्य हो | जाता है, इसी प्रकार विद्यासहित | कर्मोंसे मोक्षका आरम्भ हो सकता | है—यदि ऐसा मानें तो ? | न; आरभ्यस्यानित्यत्वादि- | सिद्धान्ती—नहीं, जो वस्तु | आरम्भ होनेवाली होती है वह त्युक्तो दोषः । | अनित्य हुआ करती है—इस प्रकार इस | पक्षका दोष बतलाया जा चुका है । | वचनादारभ्योऽपि नित्य | पूर्व०—किन्तु [ 'न स पुनरा- | वर्तते' इत्यादि ] वचनसे तो आरम्भ एवेति चेत् ? | होनेवाला मोक्ष भी नित्य ही होता है ? | न; ज्ञापकत्वाद्वचनस्य । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वचन | तो केवल ज्ञापक है; यथार्थ अर्थको वचनं नाम यथाभूतस्यार्थस्य | बतलानेवालेका ही नाम 'वचन' है । ज्ञापकं नाविद्यमानस्य कर्तृ । न | वह किसी अविद्यमान पदार्थको | उत्पन्न करनेवाला नहीं होता । हि वचनशतेनापि नित्यमारभ्यत | सैकड़ों वचन होनेपर भी नित्य | वस्तुका आरम्भ नहीं किया जा आरब्धं वाविनाशि भवेत् । | सकता और न आरम्भ होनेवाली वस्तु | अविनाशी ही हो सकती है । इससे एतेन विद्याकर्मणोः संहत- | समुच्चित विद्या और कर्मके मोक्षारम्भ- योर्मोक्षारम्भकत्वं प्रत्युक्तम् । | कत्वका प्रतिषेध कर दिया गया । तै० उ० ११–१२—