तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३ गम्यते । तदनन्यत्वप्रसिद्धेश्च । है उसीसे वह गन्तव्य नहीं होता । "तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्" और उसकी अनन्यता तो "उसे (तै० उ० २।६।१) "क्षेत्रज्ञं रचकर वह उसीमें प्रविष्ट हो गया" चापि मां विद्धि" (गीता १३।२) "सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ भी तू मुझको इत्येवमादिश्रुतिस्मृतिशतेभ्यः । ही जान" इत्यादि सैकड़ों श्रुति-स्मृतियोंसे सिद्ध होती है । गत्यैश्वर्यादिश्रुतिविरोध इति पूर्व०-[ ऐसा माननेसे तो ] चेत् । अथापि स्याद्यद्यप्राप्यो गति और ऐश्वर्यका प्रतिपादन करने- मोक्षस्तदा गतिश्रुतीनां "स वाली श्रुतियोंसे विरोध होगा—अच्छा, एकधा" (छा०उ०७।२६।२) यदि मोक्ष अप्राप्य ही हो तो भी गतिश्रुति तथा "वह एकरूप होता है", "स यदि पितृलोककामो भवति" "वह यदि पितृलोककी इच्छावाला (छा० उ० ८।२।१) "स्त्री- होता है" "वह स्त्री और यानोंके भिर्वा यानैर्वा" (छा० उ० ८। साथ रमण करता है" इत्यादि १२।३) इत्यादिश्रुतीनां च श्रुतियोंका व्याकोप (बाध) हो कोपः स्यादिति चेत् । जायगा । न; कार्यब्रह्मविषयत्वात्ता- सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वे तो साम् । कार्ये हि ब्रह्मणि स्त्र्या- कार्य ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं । दयः स्युर्न कारणे । "एकमेवा- स्त्री आदि तो कार्य ब्रह्ममें ही हो द्वितीयम्" (छा० उ० ६।२। सकती हैं, कारण ब्रह्ममें नहीं; जैसा १) "यत्र नान्यत्पश्यति" कि "एक ही अद्वितीय ब्रह्म" "जहाँ (छा० उ० ७। २४। १) कोई और नहीं देखता" "तब "तत्केन कं पश्येत्" (बृ० उ० किसके द्वारा किसे देखे" इत्यादि २।४।१४, ४।५।१५) श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । इत्यादिश्रुतिभ्यः ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri