तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 90, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ विरोधाच्च विद्याकर्मणोः समु- | इसके सिवा विद्या और कर्मका च्चयानुपपत्तिः । प्रविलीनकर्त्रा- | विरोध होनेके कारण भी उनका दिकारकविशेषतत्त्वविषया हि | समुच्चय नहीं हो सकता । जिसमें विद्या तद्विपरीतकारकसाध्येन | कर्ता-करण आदि कारकविशेषोंका कर्मणा विरुध्यते । न ह्येकं वस्तु | पूर्णतया लय होता है उस तत्त्वको परमार्थतः कर्त्रादिविशेषवत्तच्छू- | ( ब्रह्मको ) विषय करनेवाली विद्या न्यं चेत्युभयथा द्रष्टुं शक्यते । | अपनेसे विपरीत साधनसाध्य कर्मसे अवश्यं ह्यन्यतरन्मिथ्या स्यात् । | विरुद्ध है । एक ही वस्तु परमार्थतः अन्यतरस्य च मिथ्यात्वप्रसङ्गे | कर्ता आदि विशेषसे युक्त और उस- युक्तं यत्स्वाभाविकाज्ञानविषयस्य | से रहित—दोनों ही प्रकारसे नहीं द्वैतस्य मिथ्यात्वम् । “यत्र हि | देखी जा सकती । उनमेंसे एक द्वैतमिव भवति” ( बृ० उ० २ । | पक्ष अवश्य मिथ्या होना चाहिये । ४ । १४ ) “मृत्योः स मृत्यु- | इस प्रकार किसी एकके मिथ्यात्वका माप्नोति” ( क० उ० २ । १ । | प्रसङ्ग उपस्थित होनेपर जो स्वभाव- १०, बृ० उ० ४ । ४ । १९ ) | से ही अज्ञानका विषय है उस “अथ यत्रान्यत्पश्यति......... | द्वैतका ही मिथ्या होना उचित है, तदल्पम्” (छा० उ० ७।२४।१) | जैसा कि “जहाँ द्वैतके समान होता “अन्योऽसावन्योऽहमस्मि” ( बृ० | है” “वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता उ० १ । ४ । १० ) “उदरमन्तरं | है” “जहाँ अन्य देखता है वह अल्प कुरुते अथ तस्य भयं भवति” | है” “यह अन्य है मैं अन्य हूँ” “जो (तै० उ० २ । ७ । १) इत्यादि- | थोड़ा-सा भी अन्तर करता है उसे श्रुतिशतेभ्यः । | भय प्राप्त होता है” इत्यादि सैकड़ों | श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri