भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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अनु० ११] शाङ्करभाष्यार्थ ८५

सत्यत्वं चैकत्वस्य “एकधै- | तथा “एक रूपसे ही देखना वानुद्रष्टव्यम्” (बृ० उ० ४ । | चाहिये” “एक ही अद्वितीय” “यह ४ । २०) “एकमेवाद्वितीयम्” | सब ब्रह्म ही है”, “यह सब आत्मा (छा० उ० ६ । २ । १) “ब्रह्मै- | ही है” इत्यादि श्रुतियोंसे एकत्वकी वेद सर्वम्” (मु० उ० २ । २ । | सत्यता सिद्ध होती है। सम्प्रदान ११) “आत्मैवेद सर्वम्” | आदि कारकभेदके दिखायी न देने- (छा० उ० ७ । २५ । २) | पर कर्म होना सम्भव भी नहीं है। इत्यादिश्रुतिभ्यः । न च संप्रदा- | ज्ञानके प्रसंगमें भेददृष्टिके अपवाद नादिकारकभेदादर्शने कर्मोप- | तो सहस्रों सुननेमें आते हैं। अतः पद्यते । अन्यत्वदर्शनापवादश्च | विद्या और कर्मका विरोध है; इस- विद्याविषये सहस्रशः श्रूयते । | लिये भी उनका समुच्चय होना अतो विरोधो विद्याकर्मणोः । | असम्भव है। ऐसी दशामें पूर्वमें अतश्च समुच्चयानुपपत्तिः । तत्र | तुमने जो कहा था कि ‘परस्पर यदुक्तं संहताभ्यां विद्याकर्मभ्यां | मिले हुए विद्या और कर्म दोनोंसे मोक्ष इति, अनुपपन्नं तत् । | मोक्ष होता है’ वह सिद्ध नहीं होता। विहितत्वात्कर्मणां श्रुतिवि- | पूर्व०-कर्म भी श्रुतिविहित हैं, | अतः ऐसा माननेपर श्रुतिसे विरोध रोध इति चेत् । यद्युपमृद्य कर्त्रा- | उपस्थित होता है। यदि सर्पादि- | भ्रान्तिजनित ज्ञानका बाध करनेवाले दिकारकविशेषमात्मैकत्वविज्ञानं | रज्जु आदि विषयक ज्ञानके समान | कर्ता आदि कारकविशेषका बाध विधीयते सर्पादिभ्रान्तिविज्ञानो- | करके ही आत्मैकत्वके ज्ञानका | विधान किया जाता है तो कोई पमर्दकरज्ज्वादिविषयविज्ञानव- | विषय न रहनेके कारण कर्मका त्प्राप्तः कर्मविधिश्रुतीनां निर्विष- | विधान करनेवाली श्रुतियोंका उन

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