भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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८६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ यत्त्वाद्विरोधः । विहितानि च | (विद्याका विधान करनेवाली | श्रुतियों) से विरोध उपस्थित होता कर्माणि । स च विरोधो न | है; और कर्मोंका विधान भी | किया ही गया है तथा सभी श्रुतियाँ युक्तः । प्रमाणत्वाच्छ्रुतीनामिति | प्रमाणभूत हैं इसलिये पूर्वोक्त | विरोधका होना उचित नहीं है-यदि चेत् ? | ऐसा कहें तो ? न; पुरुषार्थोपदेशपरत्वाच्छ्रुती- | सिद्धान्ती-यह कथन ठीक नहीं; | क्योंकि श्रुतियाँ परम पुरुषार्थका नाम् । विद्योपदेशपरा तावच्छ्रुतिः | उपदेश करनेमें प्रवृत्त हैं । श्रुति | ज्ञानका उपदेश करनेमें तत्पर है । संसारात्पुरुषो मोक्षयितव्य इति | उसे संसारसे पुरुषका मोक्ष कराना | है, इसके लिये संसारकी हेतुभूत संसारहेतोरविद्याया विद्यया | अविद्याकी विद्याके द्वारा निवृत्ति | करना आवश्यक है; अतः वह निवृत्तिः कर्त्तव्येति विद्याप्रकाश- | विद्याका प्रकाश करनेवाली होकर | प्रवृत्त हुई है । इसलिये ऐसा कत्वेन प्रवृत्तेति न विरोधः । | माननेसे कोई विरोध नहीं आता । एवमपि कर्त्रादिकारकसद्भाव- | पूर्व०-किन्तु ऐसा माननेपर भी | तो कर्तादि कारककी सत्ताका प्रति- प्रतिपादनपरं शास्त्रं विरुध्यत | पादन करनेवाले शास्त्रका तो उससे | विरोध होता ही है ? एवेति चेत् ? | न; यथाप्राप्तमेव कारकास्ति- | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है; | स्वभावतः प्राप्त कारकोंके अस्तित्वको त्वमुपादायोपात्तदुरितक्षयार्थं | स्वीकार कर सञ्चित पापोंके क्षयके | लिये कर्मोंका विधान करनेवाला कर्माणि विदधच्छास्त्रं मुमुक्षूणां | शास्त्र मुमुक्षुओं और फलकी