तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७ फलार्थिनां च फलसाधनं न | इच्छावालोंको [ उनके इष्ट ] फलकी प्राप्ति करानेका साधन है; वह कारकास्तित्वे व्याप्रीयते । उप- | कारकोंका अस्तित्व सिद्ध करनेमें चितदुरितप्रतिबन्धस्य हि विद्यो- | प्रवृत्त नहीं है । जिस पुरुषका सञ्चित पापरूप प्रतिबन्ध विद्यमान त्पत्तिर्नावकल्पते । तत्क्षये च | रहता है उसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; उसका क्षय हो जानेपर विद्योत्पत्तिः स्यात्ततश्चाविद्यानि- | ही ज्ञान होता है और तभी अविद्याकी निवृत्ति होती है तथा वृत्तिस्तत आत्यन्तिकः संसारो- | उसके अनन्तर ही संसारकी आत्यन्तिक उपरति होती है । परमः । अपि चानात्मदर्शिनो ह्यना- | इसके सिवा जो पुरुष अनात्म- दर्शी है उसे ही अनात्मवस्तु- [हाशिए पर: ज्ञानादेव तु कैवल्यम्] त्मविषयः कामः । | सम्बन्धिनी कामना हो सकती है; कामयमानश्च करो- | कामनावाला ही कर्म करता ति कर्माणि । ततस्तत्फलोप- | है और उसीसे उनका फल भोगनेके लिये उसे शरीरादिग्रहणरूप संसार- भोगाय शरीराद्युपादानलक्षणः | की प्राप्ति होती है । इसके विपरीत जो आत्मैकत्वदर्शी है उसकी दृष्टिमें संसारः । तद्व्यतिरेकेणात्मैक- | विषयोंका अभाव होनेके कारण उसे उनकी कामना भी नहीं हो सकती । त्वदर्शिनो विषयाभावात्कामानु- | आत्मा तो अपनेसे अभिन्न है, इस- त्पत्तिरात्मनि चानन्यत्वात्का- | लिये उसकी कामना भी असम्भव होनेके कारण उसे स्वात्मस्वरूपमें मानुत्पत्तौ स्वात्मन्यवस्थानं मोक्ष | स्थित होनारूप मोक्ष सिद्ध ही है । इत्यतोऽपि विद्याकर्मणोर्विरोधः । | इसलिये भी ज्ञान और कर्मका विरोध
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri