भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९ त्येवमादीन्यपि कर्माणीतराश्रम- | भी इतर आश्रमोंके लिये प्रसिद्ध ही प्रसिद्धानि विद्योत्पत्तौ साधक- | हैं। वे तथा ध्यान-धारणादिरूप | कर्म [हिंसा आदि दोषोंसे] तमान्यसंकीर्णत्वाद्विद्यन्ते ध्यान- | असंकीर्ण होनेके कारण ज्ञानकी धारणादिलक्षणानि च। वक्ष्यति | उत्पत्तिमें सर्वोत्तम साधन हैं। आगे | (भृगु० २।५ में) यह कहेंगे च—"तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व" | भी कि "तपके द्वारा ब्रह्मको जानने- (तै० उ० ३। २—५) इति। | की इच्छा कर"। जन्मान्तरकृतकर्मभ्यश्च प्राग- | जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंसे तो ज्ञानप्राप्तौ पि गार्हस्थ्याद्विद्यो- | गृहस्थाश्रम स्वीकार करनेसे पूर्व भी गार्हस्थ्यस्य त्पत्तिसंभवात्कर्मा- | ज्ञानकी उत्पत्ति होना सम्भव है। आनर्थक्यम् र्थत्वाच्च गार्हस्थ्य- | तथा गृहस्थाश्रमकी स्वीकृति केवल प्रतिपत्तेः कर्मसाध्यायां च | कर्मोंके ही लिये की जाती है। | अतः कर्मसाध्य ज्ञानकी प्राप्ति हो विद्यायां सत्यां गार्हस्थ्यप्रति- | जानेपर तो गृहस्थाश्रमकी स्वीकृति पत्तिरनर्थिकैव । | भी व्यर्थ ही है। लोकार्थत्वाच्च पुत्रादीनाम्; | इसके सिवा पुत्रादि साधन तो | लोकोंकी प्राप्तिके लिये हैं। पुत्रादि पुत्रादिसाध्येभ्यश्चायं लोकः पितृ- | साधनोंसे सिद्ध होनेवाले उन इह- लोको देवलोक इत्येतेभ्यो व्या- | लोक, पितृलोक एवं देवलोक आदि- | से जिसकी कामना निवृत्त हो गयी वृत्तकामस्य नित्यसिद्धात्मलोक- | है, नित्यसिद्ध आत्माका साक्षात्कार दर्शिनः कर्मणि प्रयोजनमपश्यतः | करनेवाले एवं कर्मोंमें कोई प्रयोजन | न देखनेवाले उस ब्रह्मवेत्ताकी कथं प्रवृत्तिरुपपद्यते। प्रतिपन्न- | कर्मोंमें कैसे प्रवृत्ति हो सकती | है? जिसने गृहस्थाश्रम स्वीकार गार्हस्थ्यस्यापि विद्योत्पत्तौ विद्या- | कर लिया है उसे भी, जब ज्ञानकी CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri