भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 96

९० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ परिपाकाद्विरक्तस्य कर्मसु प्रयो- | प्राप्ति होती है और ज्ञानके परिपाक- जनमपश्यतः कर्मभ्यो निवृत्ति- | से विषयोंमें वैराग्य होता है तो, रेव स्यात् । "प्रव्रजिष्यन्वा अरे- | कर्मोंमें अपना कोई प्रयोजन न देखकर ऽहमस्मात्स्थानादस्मि" ( बृ० उ० | उनसे निवृत्ति ही होगी । इस विषयमें ४ । ५ । २ ) इत्येवमादिश्रुति- | "अरी मैत्रेयि ! अब मैं इस स्थानसे लिङ्गदर्शनात् । | संन्यास करना चाहता हूँ" इत्यादि | श्रुतिरूप लिंग भी देखा जाता है । कर्म प्रति श्रुतेर्यत्नाधिक्यद- | पूर्व०—किन्तु कर्मके प्रति श्रुतिका र्शनाद्युक्तमिति चेदग्निहोत्रादि- | अधिक प्रयत्न देखनेसे तो यह बात कर्म प्रति श्रुतेरधिको यत्नो | ठीक नहीं जान पड़ती ?—अग्निहोत्रादि महांश्च कर्मण्यायासोऽनेकसाध- | कर्मके प्रति श्रुतिका विशेष प्रयत्न है; नसाध्यत्वादग्निहोत्रादीनाम् । | कर्मानुष्ठानमें आयास भी अधिक है; तपोब्रह्मचर्यादीनां चेतराश्रम- | क्योंकि अग्निहोत्रादि कर्म अनेक कर्मणां गार्हस्थ्येऽपि समानत्वाद- | साधनोंसे सिद्ध होनेवाले हैं । अन्य ल्पसाधनापेक्षत्वाच्चेतरेषां न | आश्रमोंके कर्म तप और ब्रह्मचर्यादि युक्तस्तुल्यवद्विकल्प आश्रमिभि- | तो गृहस्थाश्रममें भी उन्हींके समान स्तस्येति चेत् । | कर्त्तव्य तथा अल्पसाधनकी अपेक्षा- | वाले हैं; अतः अन्य आश्रमियोंके | साथ गृहस्थाश्रमको समान-सा | मानना तो उचित नहीं है ? न; जन्मान्तरकृतानुग्रहात् । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि उनपर | जन्मान्तरका अनुग्रह होता है । यदुक्तं कर्माणि श्रुतेरधिको | तुमने जो कहा कि 'कर्मपर | श्रुतिका विशेष प्रयत्न है' इत्यादि, यत्न इत्यादि नासौ दोषः । | सो यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि


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