तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 97, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१ यतो जन्मान्तरकृतमप्यग्निहोत्रा- | जन्मान्तरमें किया हुआ भी अग्नि- दिलक्षणं कर्म ब्रह्मचर्यादिलक्षणं | होत्रादि तथा ब्रह्मचर्यादिरूप कर्म चानुग्राहकं भवति विद्योत्पत्तिं | ज्ञानकी उत्पत्तिमें उपयोगी होता है, प्रति । येन जन्मनैव विरक्ता | जिससे कि कोई लोग तो जन्मसे ही दृश्यन्ते केचित् । केचित्तु कर्मसु | विरक्त देखे जाते हैं और कोई कर्ममें प्रवृत्ता अविरक्ता विद्याविद्वे- | तत्पर, वैराग्यशून्य एवं ज्ञानके षिणः । तस्माज्जन्मान्तरकृत- | विरोधी दीख पड़ते हैं। अतः संस्कारेभ्यो विरक्तानामाश्रमा- | जन्मान्तरके संस्कारोंके कारण जो न्तरप्रतिपत्तिरेवेष्यते । | विरक्त हैं उन्हें तो [ गृहस्थाश्रमसे भिन्न ] अन्य आश्रमोंको स्वीकार करना ही इष्ट होता है । कर्मफलबाहुल्याच्च; पुत्रस्व- | कर्मफलोंकी अधिकता होनेके [कर्मविधौ श्रुतेः प्रयासप्रयोजनम्] र्गब्रह्मवर्चसादिलक्ष- | कारण भी [ श्रुतिमें उनका णस्य कर्मफलस्या- | विशेष विस्तार है ] । पुत्र, स्वर्ग एवं संख्येयत्वात्, तत्प्रति च पुरु- | ब्रह्मतेज आदि कर्मफल असंख्येय षाणां कामबाहुल्यात्तदर्थः श्रुते- | होनेके कारण और उनके लिये रधिको यत्नः कर्मसूपपद्यते । | पुरुषोंकी कामनाओंकी अधिकता आशिषां बाहुल्यदर्शनादिदं मे | होनेसे भी कर्मोंके प्रति श्रुतिका स्यादिदं मे स्यादिति । | अधिक यत्न होना उचित ही है; क्योंकि 'मुझे यह मिले, मुझे यह मिले' इस प्रकार कामनाओंकी बहुलता भी देखी ही जाती है । उपायत्वाच्च; उपायभूतानि | उपायरूप होनेके कारण भी हि कर्माणि विद्यां प्रतीत्यवो- | [ श्रुतिका उनमें विशेष प्रयत्न है ] । चाम । उपायेऽधिको यत्नः | कर्म ज्ञानोत्पत्तिमें उपायरूप हैं-ऐसा कर्तव्यो नोपेये । | हम पहले कह चुके हैं; तथा प्रयत्न उपायमें ही अधिक करना चाहिये, उपेयमें नहीं ।