भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 294 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

२० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ३ रूप बन जाता है। वास्तविकता छः ही परामर्श हैं। उनका प्रसर्पण और प्रतिसंचरण¹ होने से बारह बन जाते हैं और वे परमेश्वर की विश्वशक्ति रूप परिपूर्णता की पुष्टि करते हैं। ये सब परामर्श रूप होने के कारण परमेश्वर की शक्तिरूपिणी भगवती हैं और उनका नाम श्रीकालिका हैं²। ये शक्तिरूप शुद्ध परामर्श शुद्धविद्याभूमि में माया के उन्मेष मात्र संकोच से स्फुट भेदमय बनकर विभक्त हो जाते हैं और मायिक वर्ण रूप धारण करते हैं। ये पश्यन्ती, मध्यमा तथा वैखरी आदि वाणियों के रूप में व्यावहारिकता को प्राप्त करते हुए बाह्य तत्त्वस्वभाव प्राप्त करते हैं तब ये मायिक वर्ण ( जीवन हीन ) शरीर के समान दीख पड़ते हैं, जब पूर्वोक्त रीति से शुद्ध परामर्श के द्वारा जो उनके जीवन रूपी है, फिर से उन्हें जीवित कर दिए जाते हैं तब वे वीर्यशाली हो जाते हैं। तब वे उस प्रकार जीवनाधान से उस प्रकार रहते हुए भी भोग तथा मोक्ष के प्रदान करनेवाले बनते हैं। इस प्रकार सब परामर्शों के विश्राम ही जिसका एकमात्र स्वभाव है और जिसमें विभिन्न तत्त्व तथा भुवन प्रतिबिम्बित हो रहे हैं उस आत्म-स्वरूप को देखने पर निर्विकल्पक शाम्भव समावेश³ से जीवन्मुक्ति की प्राप्ति होती है। इसमें भी पहले की तरह मन्त्र आदि का कष्ट⁴ नहीं है। १. जब अनुत्तर आनन्द में, इच्छा ईशान में, उन्मेष ऊर्मि में प्रसृत होते हैं तब उन्हें प्रसरण और जब अ + इ, अ + उ, इ + अ, उ + अ, अ + बिन्दु, अ + विसर्ग तब जो जो वर्ण बनते हैं वे प्रतिसंचरण से बनते हैं। २. कालिका बारह हैं। 'कलयन्ति क्रमन्ते इति कालिका' कलन करते हैं इसलिए ये कालिका हैं। ३. स्वात्मरूप चिदाकाश में विश्व की जो भासना है वह मैं ही हूँ। वर्ण, मंत्र, पद तथा कला तत्त्व और भुवन रूप जो छः अध्वाएँ हैं वह सब मेरे स्वरूप में ही प्रतिबिम्बित, स्वरूप में उदित तथा उनका विलयन भी मेरे बोधरूपी अनल में हो रहा है इसप्रकार बोध में स्थित योगी शाम्भव समावेश में समाविष्ट ऐसा कहा जा सकता है। उनके बोध में सृष्टि आदि विभाग-रहित होकर अखंड बोध रूप में भासते हैं। ४. साधन मार्ग में स्नान, व्रत, देहशुद्धि, धारणा, मंत्र, याग, होम आदि बहु आयाससाध्य कर्तव्य हैं। शाम्भव उपाय में प्रविष्ट योगी के लिए ये अनावश्यक हैं।