तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
DevanagariHindipublished294 पृष्ठ
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आ. ३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २१ इस आत्मरूपी दर्पण के स्वच्छ तल में समग्र विश्व भास रहा है, परबोध स्वभाव परमेश्वर अपने विमर्शरूप चमत्कार रस का आस्वादन करते हुए विश्व का परामर्शन कर रहे हैं, लेकिन जड़ दर्पण अपने तल में जिन विचित्र रचनाओं का निर्माण करता है उस विषय में उसका परामर्शन नहीं होता । संवेदनशील बोधरूपी इस निर्मल दर्पण में सभी अपने स्वसंवेद्य स्वरूप लेकर ही भासते हैं क्योंकि आमर्शन रस से उनका विमर्शन होने से वे सत्य ही प्रतीत होते हैं । इस प्रकार अपने निर्मल आत्मा जो सब वस्तुओं का रूप हैं इसकी योजना ( सम्बन्ध ) कर सकने या वह पर भैरव स्वरूप होकर परमानन्द को प्राप्त करता है । इति तृतीय आह्निक ।