भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

२८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ४ तथा विश्वात्मक हूँ। इस प्रकार विकल्प मायान्ध पशुओं में उत्पन्न नहीं होता क्योंकि उनमें सत् तर्क¹ आदि का अभाव है। वैष्णव आदि (सम्प्रदाय में स्थित) अपने प्रदर्शित आगमों में रागतत्त्व के द्वारा नियन्त्रित रहकर ऊर्ध्वदर्शनों में प्रतिपादित विषयों की ओर उन्मुख नहीं होते, इसलिए वे सत् तर्क, सदागम और सद् गुरु के उपदेश के द्वेषी होते हैं। जैसे पारमेश्वर आगम² में कहा गया है। 'वे सभी वैष्णव आदि सम्प्रदाय विद्याराग से रंजित होकर सर्वज्ञ परमेश्वर के ज्ञान से वर्जित रहते हैं और परम तत्त्व को प्राप्त नहीं करते।' अतः शिव सम्बन्धी शक्तिपात के द्वारा आविद्ध जीव ही सदागम के क्रम से विकल्पों का संस्कार करते हुए पर-स्वरूप में प्रवेश करते हैं। अब प्रश्न यह है—इस प्रकार होने से क्या परम तत्त्व विकल्प का विषय नहीं हुआ? नहीं, द्वैत संस्कार का निराकरण करना ही विकल्प संस्कार की सार्थकता है, क्योंकि परम तत्त्व सर्वत्र सर्वरूप होने के कारण स्वप्रकाश रूप है—इसलिए विकल्प न तो किसी के उपकार के लिए या खण्डन के लिए उपयोगी है। अत्यन्त तीव्र शक्तिपात जिस जीव पर होता है उसमें स्वभाव से ही सत् तर्क का उदय होता है—जो देवियों के द्वारा दीक्षा प्राप्त हुआ ऐसा कहा जाता है। इससे भिन्न जीवों को १. शक्तिपात की मात्रा कम होने पर माया के द्वारा मलिन जीवों में स्वभाव से सत् तर्कों का उदय नहीं होता, किन्तु आगमों के उपदेश से धीरे-धीरे सत् तर्क उदित होता है। २. आगम शंकाहीन अर्थात् सन्देहरहित सजातीय विकल्पात्मक है। उसी से समुचित विकल्प उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार समुचित विकल्पों के प्रवाह ही विशुद्ध विकल्प है—वही सत् तर्क का स्वरूप है। उसे ही भावना कहते हैं। भावना को सर्वकामदुधा कहा गया है। इस शास्त्र में तर्क योग के छः अंगों के अन्यतम है। प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा और तर्क इन छः अंगों में तर्क को उत्तम कहा गया है, क्योंकि यह हेय और यह उपादेय है, इस प्रकार विचार करता हुआ योगी शीघ्र ही तत्त्वज्ञ बन जाते हैं। इस प्रकार तर्क के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति के उपाय रूपी अन्य शास्त्रों को हेय कोटि में रखकर उपादेयरूपी सर्वोत्तीर्ण परम प्रकाशमय तत्त्व में प्रविष्ट होते हैं।