तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ४ है—जैसे भार का ढोना, शास्त्रार्थ का बोध और नृत्त का अभ्यास की तरह, संवित् स्वरूप में न तो किसी का ग्रहण करना है, न किसी को हटाना है, इसलिए अभ्यास कैसे होगा ? तब तर्क से भी क्या होगा ? द्वैत बोध की वासना को हटाने का यह एक उपाय मात्र है यहाँ यही कहा गया है—इसका अन्य कुछ उद्देश्य नहीं है। या लौकिक अभ्यास में भी सब रूप चिदात्मक है, अतः भिन्न भिन्न शरीरों में इष्ट रूप को प्रकट करना, उससे भिन्न रूप को गौण कोटि में रखना—यही अभ्यास का तात्पर्य है। परम तत्त्व के विषय में तो किसी का भी निराकरण नहीं करना है। द्वैत विषयक वासना भी कोई अलग वस्तु नहीं है अपितु वह केवल स्वरूप की ही अख्याति मात्र हैं, इसलिए द्वैत का निराकरण विकल्प से किया जाता है—ऐसा ही कहा गया है। परमार्थ यह है कि जो प्रकाशमान स्वरूप हैं जिसने अपनी स्वतन्त्रता से अख्याति रूप को धारण कर लिया है क्रम से उसे त्याग करते हुए विकसोन्मुख, विकसित होने वाला और अन्त में विकसित इस क्रम से प्रकाशित होते हैं। ऐसा प्रकाशन भी परमेश्वर का स्वरूप ही है, इसलिए इस विषय में (प्रकाशन में) योगांग साक्षात् उपाय नहीं है। तर्क को (योगांग) उपकार करते हैं, तो भी सत् तर्क ही साक्षात् उसमें (स्वरूप के प्रकाशन में) उपाय है, वही शुद्ध विद्या है। (विकल्प) नाना प्रकार से संस्कृत होता है— जैसे याग, १ होम, जप, व्रत और योग आदि है। सब भावों की स्थिति परमेश्वर में ही है—उनसे भिन्न कोई वस्तु नहीं है—इस प्रकार विकल्प विषयक दृढ़ निष्ठा की सिद्धि के लिए परमेश्वर में सब भावों का अर्पण करना ही याग है। यह (याग) हृदयहारी है अतः जो कुछ संवित् स्वरूप में स्वतः ही अनुप्रविष्ट होते हैं उन्हें परमेश्वर को अनायास अर्पित किये जा सकते हैं इस अभिप्राय से मनोहर कुसुम और गन्ध आदि का बाहर भी उपयोग होता है ऐसा कहा गया है। सब भावराशि परमेश्वर के तेजः स्वरूप हैं इस प्रकार दृढ़ विकल्प की सिद्धि के लिए परमेश्वररूपी संविदनल शिखा जो सब भावमण्डल के ग्रसन के रसिक हैं उसमें उनके तेजः स्वरूप हो अन्त में शेष रहे इस प्रकार से विलयन करना ही होम है। उसी प्रकार बाह्य और आभ्यन्तर प्रमेयों के रूप में भिन्न-भिन्न भावों की अपेक्षा न करते हुए इस प्रकार वह परमतत्त्व १. यहाँ याग आदि का जो उल्लेख हुआ है वह भी सत्तर्करूपी है।