तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ३१ जो स्वाभावरूप है हृदय में उसका अनुसन्धान ही जप है। सब जगह, सर्वदा उपाय रहित (उपायों के अगम्य) परमेश्वर विषयक अभिमान की प्राप्ति के लिए शरीर तथा घट आदि परमेश्वर का ही तुल्य स्वरूप है—इस प्रकार अभिमान से देखना ही व्रत है। श्री भर्गशिखा में जैसे कहा गया है— 'सब के साथ समता ही उत्तम व्रत है।' शुद्धविद्या के अंशरूपी विभिन्न प्रकार के विकल्पों के द्वारा अन्य- निरपेक्ष विकल्प जो स्व-भाविक है और जिससे परमार्थ तत्त्व प्रकाश में आ जाता है, वह नित्य वैसे ही प्रकाशमान हैं इस प्रकार दृढ़ प्रतिपत्ति के लिए उसके स्वरूप का अनुसन्धानात्मक विकल्प विशेष योग है। इसमें परमेश्वर पूर्ण संवित्स्वभाव हैं, पूर्णता ही उनकी शक्ति हैं जो कुल, सामर्थ्य, ऊर्मि, हृदय, सार, स्पन्द, विभूति, त्रिशीका, काली, कर्षणी, चण्डी, वाणी, भोग, दृक, नित्या इत्यादि आगम भाषाओं से तत्तत् शब्दों की सार्थकता प्रतिपादित करती हुई कही जाती हैं, जो उन विभिन्न रूपों में ध्यान करनेवालों के हृदय में विराजती हैं। वह समग्र शक्तिरूपिणी है इस प्रकार दृष्टि में आ जाने से पूर्णतारूपिणी संवित् का प्रकाशन होता है। परमेश्वर की शक्तियाँ असंख्य हैं। अधिक क्या, जो विश्व है वह उन्हीं की शक्तियाँ हैं, अतः इस विषय में उपदेश करना सम्भव नहीं। यह विश्व तीन शक्तियों १ से समाप्त हो जाता है। शिव से पृथिवी तक
१. समग्र विश्व तीन शक्तियों का विलास है। एक श्री पराशक्ति जिसके द्वारा शिव से पृथ्वी तक तत्त्वराशि निर्विकल्प संविद् रूप में भासित होता है, दूसरी परापराशक्ति है जिससे दर्पण में हस्ती की छाया के सदृश दर्पण रूप में अभिन्न होकर भी हस्ती रूप में उससे भिन्न प्रतीत होता है और तीसरी भेदमय मायिक स्थिति है जहाँ भेद ही प्रधान है। इन तीनों के शक्ति के अन्तराल में जो शक्ति सब में अनुस्यूत है वह भी पराशक्ति का ही एक रूप है जिसके पर्याय मातृसद्भाव, कालकर्षिणी आदि है। प्रत्येक शक्ति सृष्टि, स्थिति और संहार के क्रम से तीन-तीन होने के कारण कुल बारह बनती हैं। पूर्ण चैतन्य की अभिव्यक्ति जिस शक्ति के द्वारा होती है और जिससे काल का क्रमिक धारा चिरकाल के लिए अस्तमित हो जाती है वही कालसंकर्षणी की स्थिति है। सभी प्रमाताओं में प्रमिति क्रिया का कर्तृत्व रूप प्रमातृत्व इस मातृसद्भाव रूप शक्ति के कारण ही सम्भव होता है।